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प्रश्नोत्तर P15-0137 · भाग 15

गुरु जी, काम, क्रोध, मोह, लोभ — ये सब आत्मज्ञान के बाद खत्म होते हैं या फिर ब्रह्मज्ञान के बाद?

आत्मज्ञान के बाद जीवन में एक बात पक्की हो जाती है — वो व्यक्ति बेईमानी नहीं कर सकता। और काम, क्रोध, मद, लोभ, मोह में से लालच तो पूरी तरह खत्म हो जाती है। अब बचा काम — तो कर्म तो उसे करना है, पर कर्ता का भाव नहीं रहेगा; जो उसे मिला है वही बांटेगा। क्रोध भी होगा, लेकिन लोगों के लिए होगा, अगर उसे करना पड़ेगा; ऐसे ही नहीं आएगा। जैसे एक मां अपने दो-तीन साल के बच्चे पर क्रोध करती है — क्या वो उस पर क्रोध कर रही है? नहीं; और ज्यादा चोट लग जाए तो वो रोती भी है। उसने सुधारने का प्रयास किया। इस तरीके से आत्मज्ञान के बाद भी व्यक्ति क्रोध करता है — जैसे राम ने समुद्र पे क्रोध किया: तीन दिन प्रार्थना की, विनती की; वो तो पहले भी ताकतवर थे, पहले दिन बाण उठा लेते, लेकिन नहीं, पहले प्रार्थना। उसके अंदर अहम भाव, मैं का भाव, अहंकार नहीं रहता, और लोभ-मोह तो रहता नहीं; यह काम और क्रोध बचा रहता है, और उसका वो उपयोग करता है। उसे कुछ भी नहीं चाहिए, फिर भी वो पहले से ज्यादा मेहनत करता है। और अगर मेरे से कोई पूछता है तो मैं कह देता हूं — हां, काम भी है, क्रोध भी है, मद भी है, लोभ भी है, मोह भी है, सब है। कभी धोखे में मेरे पास ना आओ कि इनके अंदर ये सब नहीं है; आना तो ज्ञान के लिए आना, अपने प्रश्नों के उत्तर लो और अपना आत्मिक कल्याण करो।

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वीडियो: हमारी स्मृतियां कब संस्कार बनती हैं ?#प्रत्यक्षज्ञान #yogijikasatsang #साधना #आध्यात्म · 2026-08-11