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प्रश्नोत्तर P17-0146 · भाग 17

गुरु जी, जब मैं उसी का अंश थी, उसी से थी, तो क्या मेरी वहां कोई अलग पहचान थी? और आत्मज्ञान या ब्रह्मज्ञान के बाद क्या मैं वही हो जाती हूं?

उसके जैसे थे — वही नहीं। यहां सब अलग-अलग हैं, तभी तो भटक रहे हैं; अगर एक ही होते तो कौन भटकता, कहां भटकता? परमात्मा अलग ही है; गुरु को परमात्मा का स्वरूप कहा गया — स्वरूप यानी रूप हटा दो तो स्व — वह उसके जैसा है। शिष्य भी आत्मज्ञानी हो जाता है तो गुरु के जैसा बन जाता है। जैसे कोई अनेक बच्चों को जन्म देकर बाप बन सकता है, पर अपने बाप का बाप कभी नहीं बन सकता — उसके जैसा हो गया। इस पेड़ से जितने पेड़ होंगे, तत्व और गुणधर्म वही रहेंगे, सब इसके जैसे होंगे, पर यही नहीं हो सकते।

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वीडियो: मूल से मेरा हटना कैसे हुआ ? रविवार प्रश्नोत्तरी #योगी · 2025-12-21