प्रश्नोत्तर P18-0034 · भाग 18
गुरु जी, "कुछ नहीं चाहिए" तक की यात्रा में अवधूत स्थिति कैसे बनती है और वह कैसी होती है?
जब तक "अपने तरीके से चाहिए", जीव दस दिशाओं (चार दिशा, चार कोण, ऊपर, नीचे) में यात्रा करता है। खोजी ग्यारहवीं दिशा में यात्रा करता है कि अपने तरीके से छुड़ाना है; छुड़ा लेता है तो वह दिशा भी खत्म, वह "चाहिए" में, जरूरत में जीता है। और "चाहिए" से भी मुक्त हो गया तो बनती है अवधूत स्थिति — वह ज्ञान के बहुत करीब रहता है, उसी में आज्ञा चक्र खुलता है। वह स्थिति पागल जैसी होती है: कुछ नहीं चाहिए तो बचा क्या, जिए कैसे? न ज्ञान, न अज्ञान, न सुख, न दुख, न पाप, न पुण्य, न मैं गृहस्थ, न संन्यासी — कुछ भी नहीं; खोज भी खत्म, जिसकी खोज थी वह भी नहीं चाहिए। मैं उस स्थिति से गुजरा था — एक ही आवाज निकलती थी: तूने कहीं का नहीं छोड़ा, न जिंदा न मुर्दा, आत्महत्या भी नहीं कर सकता इतनी समझ दे दी। सारी मांगें, इच्छाएं, उसकी भी कामना खत्म — "हो गया" भी खत्म हो जाता है। उसके बाद ज्ञान होता है।
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वीडियो: योगीजी की आत्मकथा अज्ञान से ज्ञान तक खोज में कुछ अनुभव की बातें ! #yogijikasatsang #pratyakshgyan · 2024-08-25