प्रश्नोत्तर P21-0057 · भाग 21
गुरु जी, मेरे अंदर एकांत का भाव रहता है — कहीं जाना हो तो मैं अकेला जाता हूं, ऐसी इच्छा नहीं रखता कि कोई साथ हो। क्या यह ठीक है?
तुझे एकांत क्यों चाहिए पता है? तेरा नेचर किसी से मिलता ही नहीं, किसी से जम ही नहीं रहा; एक भी आदमी नहीं मिल रहा जो तुझे समझ पाए, तो मजबूरी में एकांत जाना पड़ रहा है — तू चाह तो रहा है कि तेरे जैसा कोई मिले। एक पत्नी को धन चाहिए? नहीं, उसे तेरा साथ चाहिए। तू सोच रहा है उसे सब मिला — गहने, सोना-चांदी — पर जो चाहिए था वो मिला ही नहीं; उसे तू चाहिए था और तू कहीं और है। वो कुछ कहना चाहती है, तुझे सुनने का समय ही नहीं; वो तेरे साथ जीना चाह रही थी और तुझे कहीं और जीना था। वो जानवर थोड़ी है कि भूसा डाल दिया, त्यौहार पर रंग दिया — फीलिंग है उसके पास, एहसास है। तो ना तेरा साथ किसी को मिला, ना तूने किसी का साथ दिया — सीधी सी बात। अब देख ले, जिस उद्देश्य से इस धरती पर आया उसे पूर्ण करने की तीव्र इच्छा है तो बस कर ले — वो तेरे हाथ में है, किसी के हाथ में नहीं, यहां तक कि गुरु के भी हाथ में नहीं। गुरु तो सिर्फ सतमार्ग बता रहा है; माया में फंसो या भवसागर से निकल जाओ, सब तुम्हारे हाथ में है।
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