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प्रश्नोत्तर P21-0059 · भाग 21

गुरु जी, ठीक शब्द अपनाने से लोग धीरे-धीरे दूर हो गए, अब अकेलापन सताता है। मन करता है अपने मार्ग के सत्संगियों के साथ बैठकर बातें करूं, जबकि पहुंचा तो कोई भी नहीं है — क्या यह ठीक है?

बातें कर लेना, लेकिन बातें करने में वहां दबाव-संकोच ना हो। अपनी बात कुछ ऐसी है तो रख देना, अगर दोनों एक मार्ग के मार्गी हों; लेकिन अगर कोई बात नहीं समझ रहा है तो समझाने का प्रयास मत करना। जैसे तुमने कोई घटना बताई और उसे लगा मजाक है, क्योंकि उसके साथ नहीं घटी — वहां राग-द्वेष ना हो जाए ये देखना, क्योंकि अभी उसकी भी यात्रा है। उतनी ही बातें करो जितना वो समझे। कुछ अगर आंतरिक घटना घटी है तो वो किसी से मत बोलो, गुरु से कहो, क्योंकि वो प्रश्न कर देगा "ऐसे कैसे, सिद्ध करो", तो तुम राग-द्वेष में फंस जाओगे कि इसने मेरी बात काट दी। इतनी ही बातें करो जितना सिद्ध कर सकते हो।

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