प्रश्नोत्तर P22-0009 · भाग 22
गुरु जी, हम कोई भी काम यह सोचकर करते हैं कि इससे खुशी मिलेगी, बाद में वह खुशी खत्म हो जाती है; अंदर से कुछ खाली लगता है तो सोचते हैं इसे भरूं — गाड़ी या मकान खरीद लूं — क्या करें?
आप काम को जरूरत में करो, खुशी के लिए क्यों करते हो? खाली को भरना — यह पागलपन है। उसकी जरूरत है क्या? क्यों खरीद रहे हो? जरूरत नहीं है तो मत खरीदो, बात खत्म; बैठो अपने आप में। बैठा भी नहीं जाता, क्योंकि अंदर से खींचता है कि बैठे क्यों हो, कुछ करो। कुछ करना ही तो दुख है — आपके तरीके से होगा तो सुख, नहीं होगा तो दुख। तो जरूरत में जीना चालू करो, कुछ करने से मुक्त हो जाओ; क्योंकि जब तक कुछ करना चाहोगे तब तक दुख है। आप सुख की इच्छा में कर रहे हो, सुख मिल नहीं रहा — क्षण भर मिलेगा, बाद में वही दुख देगा। तो सुख की इच्छा का त्याग करो; जितना गहरा सुख होगा उतना गहरा दुख है। जरूरत में जियो — ना सुख है ना दुख। सुख-दुख एक ही चीज है, वह है ही नहीं। श्मशान में बैठे रहते हो, चिता आती है, जलती है, आपको दुख नहीं होता; कोई बोल दे तुम्हारे रिश्तेदार की है तो जैसा लगाव रहेगा वैसा दुख होगा — जितना गहरा सामने वाले से जुड़ाव, उतना दुख, उतना सुख।
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वीडियो: जिंदगी में दुख है तो जीना क्यों है ? #योगीजी_का_सत्संग · 2025-03-05