प्रश्नोत्तर P22-0008 · भाग 22
गुरु जी, पहले जो कुछ किया उसमें मस्त थे, अब सब बेकार लगता है और घुटन होती है — ऐसा क्यों?
पहले बेकार नहीं लग रहा था, पहले तो उसमें जी रहे थे मस्त। बेकार तब लगने लगा जब समझ में आया कि इसका आखिरी परिणाम यही है — भोग-भोग के बोर हो गए। जब आपने देखा कि सारी मिठाइयों का हाल वही है, बस ऊपर से रूप बदला है; सारे भोजन का, सारे कपड़ों का, सारे मोबाइल का, सारी गाड़ियों का हाल वही है — तो अब उससे छुटकारा कैसे पाऊं, उसके लिए निकल गए। आपने कई वर्षों तक मान के चक्कर में जिया है; अब समझ में आ रहा है कि मैंने स्वाद में क्या-क्या कर दिया। हर लोगों से पहले मिलने में यही कहा कि तुम्हारे जैसा कोई नहीं, और आखिर में छोड़ते वक्त भी यही कहा कि तुम्हारे जैसा कोई नहीं। भोगते-भोगते समझ में आ गया कि है कुछ नहीं — घुमा-फिरा के सब वही है, बस क्षणिक सुख है, चाहे भोजन हो चाहे भोग। अब जितना किया है वह घुटन दे रहा है, क्योंकि आगे स्वाद चाहिए नहीं। अब आप पिछले किए गए कर्म की घुटन से निकलना चाहते हो, वह आपको अशांति दे रहा है। जिन-जिन से जो वादे किए, वे याद आ रहे हैं, दबोच रहे हैं — क्योंकि वादा भी हम अपनी कामनाओं को पूरा करने के लिए ऐसा करते हैं जो पूरा नहीं होगा: "चांद-तारे तोड़ के लाएंगे", "तुम्हारे बिना जी नहीं सकते", "तुम्हारे लिए प्राण दे देंगे" — कब तक? बस भोग के लिए; भोग मिल गया, बात खत्म। आप वादा पूरा नहीं कर पाए, आपने उसे यूज किया — वहां से नेगेटिव वाइब्रेशन आ रहा है। आपके परेशानी का कारण आपका अतीत है, यानी आपका किया गया कर्म। विचारों से कोई परेशानी नहीं — जितना तुमने कर्म किया उन विचारों से परेशानी है। विचार तो ऑप्शन हैं: बाजार में अनेक दुकानें खुली हैं, भीड़ है, कोई दुकान आपको परेशान नहीं करती; लेकिन वहीं एक शत्रु दिख जाए तो परेशान कर देता है। ये विचार अतीत के हैं, तुम्हारे किए गए कर्म से अंदर से आ रहे हैं, बाहर के विचार परेशान नहीं कर रहे।
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वीडियो: जिंदगी में दुख है तो जीना क्यों है ? #योगीजी_का_सत्संग · 2025-03-05