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प्रश्नोत्तर P22-0011 · भाग 22

गुरु जी, कभी-कभी अपने तरीके से होने के बावजूद भी दुख होने लगता है — ऐसा क्यों?

बात यह है कि पहली बार उसी ने सुख दिया था, अब उससे थक गए हो, कुछ नया चाहिए। यह भोग-भोजन में ही होता है — रोज वही रोटी-चावल खाओ तो थक जाते हो, फिर पुलाव चाहिए, उसी का परांठा चाहिए, पूड़ी चाहिए, बदल-बदल के चाहिए। ऐसे ही रिश्तों से लोग थक जाते हैं, नया-नया चाहिए — उसमें मीठी बातें होती हैं, जैसा तुम चाहते हो वैसा सामने वाला कुछ दिनों तक बोलेगा। बस "अपने तरीके से चाहिए" का त्याग करो, बात खत्म। जरूरत में जियो — ना सुख है ना दुख। ईमानदारी-सत्कर्म करोगे तो विचार अच्छे आएंगे; ईमानदारी-सत्कर्म तो फाइनल निकलने के लिए है, लेकिन जीवन जीने के लिए जरूरत में जीना चालू करो — ना सुख, ना दुख।

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वीडियो: जिंदगी में दुख है तो जीना क्यों है ? #योगीजी_का_सत्संग · 2025-03-05