आध्यात्मिक प्रत्यक्ष ज्ञान · ऐप में खोलें

प्रश्नोत्तर P22-0040 · भाग 22

गुरु जी, संसर्ग भी कई तरह के हैं — दर्शन से दृष्टि का, स्पर्श का, बार-बार गुरु वाणी सुनने से श्रवण का, साथ खान-पान का, और एक ही स्थान पर उपस्थिति का — क्या इन संसर्गों में अलग-अलग भेद है?

जब आप उसके पास रहते हो तो पांचों इंद्रियों से वह कुछ ना कुछ आपको देता रहता है — आपको देखता है तो भी दे ही रहा है। हर वक्त हर व्यक्ति ले भी रहा है और दे भी रहा है। आप किसी को देख रहे हो, उससे सुख ले रहे हो — हो सकता है उसे घुटन हो रही है, आप उसे दुख दे रहे हो; हो सकता है उसे भी आपका देखना अच्छा लग रहा है, तो दोनों एक-दूसरे से सुख ले रहे हैं। कर्मभूमि में हर वक्त लेन-देन चल रहा है — आंखों से, कानों से, सुगंध-दुर्गंध से, श्वास से, स्पर्श से। संसार में लेन-देन है — दे तो रहा है, लेकिन एक तरफ देके दूसरी तरफ से आपको खाली भी कर रहा है; हर आदमी दे तो रहा है और फिर ज्यादा ले रहा है — यही संसार का चक्कर है। लेकिन गुरु के यहां बस देन है, लेन है ही नहीं — इसलिए तुम वहां भर जाते हो। गुरु वन-वे है, बस देता रहता है; उसके पास देने के अलावा कुछ है नहीं, और तुम्हारे पास जो कुछ है वह उसके काम का नहीं, उसे तो कुछ चाहिए नहीं। हां, पात्रता होनी चाहिए — जितनी आपकी पात्रता होगी उतना मिलेगा।

सत्संग वीडियो देखेंऐप में खोलें

वीडियो: माया को सस्ती क्यों कर देती है ब्रह्म की मस्ती ? / #योगीजी_का_सत्संग · 2025-04-21