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प्रश्नोत्तर P22-0043 · भाग 22

गुरु जी, कहते हैं गुरु के पास रहना सबसे कठिन है — ऐसा क्यों?

गुरु के पास प्रेम होता है, दया नहीं — साबुन होता है धोने के लिए; धुलाई होती है, वह दया नहीं करता। बचपन में हमें अगर फोड़ा हो जाता था, तो मां-पिता टांग-पांव पकड़ के उसे जोर से दबा के निकालते थे और हम जोर से तड़पते थे। जब तक उसकी कील नहीं निकलेगी तब तक वह सड़ेगा, और उसे निकालने के लिए इतना जोर से दबाना पड़ता है कि सामने वाला चिल्लाने लगता है — लेकिन वे दबा रहे हैं। यही काम गुरु का है — तुम्हारी गंदगी निकालने का। आपके अंदर गंदगी है, उसको निकालने में बहुत पीड़ा हो रही है, लेकिन करें क्या? अभी तुम्हारी ताकत नहीं कि अपने हाथों से निकाल लो — एक बालक को बोल दो कि अपने फोड़े की कील निकाल ले, नहीं निकाल पाएगा; उसके मां-बाप आसानी से निकाल देते हैं, लेकिन उसके लिए उसे पीड़ा झेलनी पड़ती है। वैसे ही आप लोगों को बहुत पीड़ा होगी — अभी तो शुरुआत है, अभी तो फोड़ा केवल दिखाया है, ऊपर-ऊपर दिख रहा है; गुरु को तो दिख गया। अगर पक्का निकलना है तो बहुत तकलीफ का सामना करना पड़ेगा। अभी तो तैयार किया जा रहा है, बनाया जा रहा है — धीरे-धीरे; फोड़ा बहाते वक्त भी पहले सीधा नहीं दबाते, प्यार से सहलाते हैं — "बेटा, दर्द नहीं होगा।" गुरु तब रगड़ता है जब पूरी तरह हाथ में आ जाते हो; जब तक उसे लगता है कि तुम छुड़ा के भाग जाओगे, तब तक वह कुछ करता नहीं। जब गुरु को पता चल जाए कि अब तुम नहीं भागोगे, वहां से तुम्हारी रगड़ाई शुरू; अभी तो रगड़ाई बस इतनी हो रही है जितनी आप सह सको। गुरु के यहां माल देख सकते हो, खा नहीं सकते — देख के मुक्त हो।

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