प्रश्नोत्तर P22-0044 · भाग 22
गुरु जी, आपने तो मार्ग में कोई गुरु बनाया नहीं — फिर आपकी रगड़ाई कैसे हुई?
हमने अपने आप को ही रगड़ दिया — अच्छे तरीके से। दिसंबर-जनवरी के महीने में नर्मदा तट पे शाम को नहाना, ठंड के महीने में ऐसे ही सोना; जब तक कर सकता था तब तक व्यवस्था नहीं की, रात 12–1 बजे के बाद जाके व्यवस्था करना — पहले अपने आप को फंसाना, फिर निकालना; और सुबह तक इंतजार करना, क्योंकि 12–1 बजे के बाद कौन देगा, शाम की तो व्यवस्था ही नहीं की। हमने अपने ऊपर खुद काम किया। उस समय एक साधक के रूप में यह एहसास में आ गया कि इसके अलावा रास्ता नहीं है, क्योंकि द्वैत है — जब तक दूसरा पहलू नहीं लेंगे, केवल एक नहीं मिल सकता। तो पहले दुख की मात्रा को ही बढ़ाओ, सुख अपने आप खत्म हो जाएगा। मुझे छोड़-छोड़ के भागने की इच्छा नहीं थी, क्योंकि फैसला मेरा था — किसी ने मुझ पर फैसला थोपा नहीं था। जब भी ऐसा कुछ हुआ, मैंने अपने से कहा — "फैसला लिया है, तुझे चलना पड़ेगा; फैसला तेरा था, सब तो मना कर रहे थे — मां से लेकर सब मना कर रहे थे कि इस मार्ग में मत जाओ — तो चले हो तो चलो, आगे बढ़ो, फिर आखिर तक।"
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