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प्रश्नोत्तर P22-0061 · भाग 22

गुरु जी, आप इतने सारे साधकों के भोजन की व्यवस्था कैसे कर पाते हैं? क्या ईमानदारी में इतनी शक्ति है?

बिना प्रयास के हो रहा है — इसमें मेरा कोई प्रयास नहीं, सब अपने आप हो रहा है। यहां जिस दुकान से सामान आता है, उसे बोलता हूं पैसा ले लो, तो बोलते हैं "आराम से देना"; हिसाब जोड़ने में उनको कई महीने लग जाते हैं — "आज बना दूंगा" करते-करते महीने लगा देते हैं — और मैं भी बेफिक्र हो जाता हूं कि बिल ज्यादा हो जाएगा तो हो जाएगा, देने के लिए मैं हूं ना। दुकान वाले सामने से सामान भेज देते हैं; मुझे जरा सा भी यह नहीं बोलना पड़ा कि आप मुझे सामान दो, मैं बाद में पैसा दूंगा। बड़ी अजीब बात है — हमें कभी प्रयास नहीं करना पड़ा, कभी 1% भी दिक्कत नहीं आई; आप इतने दिनों से देख रहे हो, कभी यहां कोई सामान की कमी पड़ी? भाव से कर रहे हैं, इसलिए जैसे भी हो, हो रहा है; हमारा 1% भी प्रयास नहीं है, यहां स्वार्थ नहीं है।

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