प्रश्नोत्तर P22-0101 · भाग 22
गुरु जी, बचपन से हमें सिखाया गया है कि नाश्ता राजा जैसा, दोपहर का भोजन रानी जैसा और रात का भोजन भिखारी जैसा करो; कहा जाता है कि नाश्ता भारी करना चाहिए ताकि दिन भर काम करने की ऊर्जा मिले। यह तो उल्टा है?
काम करने के लिए? यहां कौन चौका-बेलन करता है, कौन किसानी करता है? वह उनके लिए बोला गया है जो दिन भर शरीर से खूब मेहनत करते हैं। यह व्यवस्था मैं साधक के लिए बोल रहा हूं; आप किसानी करते हैं तो यह आपके लिए नहीं, चक्कर आने लगेगा। घर पर भी फॉलो कर सकते हैं, अगर शारीरिक मेहनत ज्यादा नहीं, बुद्धि के स्तर की मेहनत कर रहे हैं; शरीर से खट रहे हैं तो भोजन खूब चाहिए, नहीं तो शरीर टूट जाएगा। यह सिस्टम इसलिए रखा कि जब भूख है तो आप भोग की तरफ नहीं जाओगे। आदमी कितना भी कामी हो, उसे एक हफ्ते तक पानी-भोजन मत दो, फिर भोजन और भोग दोनों की व्यवस्था कर दो — वह सबसे पहले भोजन ग्रहण करेगा, भोग बाद में। इसलिए भोजन कम करेंगे तो ध्यान भोग पर न जाकर भोजन, शरीर और अपने आप पर जाएगा, और आत्मिक चिंतन बहुत तेजी से बढ़ेगा — इंद्रियां कमजोर होंगी, भोग की ताकत ही नहीं रहेगी। आपको क्या लगता है ज्यादा खा के स्वस्थ हैं? नहीं, कम खा के स्वस्थ रहेंगे, बल बढ़ेगा। एक हफ्ते कम भोजन करके देखिए — कम नींद आएगी, कम आलस्य आएगा, ऊर्जावान महसूस करेंगे; ज्यादा भोजन में नींद और आलस्य रहेगा। आप आजमा सकते हैं।
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वीडियो: हम जरूरतमंद की पहचान कैसे करें ? || pahchan kaise kare jaruratmand || #livesatsang · 2025-04-20