प्रश्नोत्तर P22-0143 · भाग 22
गुरु जी, यह समझ कि "शरीर है और मैं हूं" टिकी क्यों नहीं रहती, फिसल क्यों जाती है?
ये समझ इसलिए फिसल जाती है कि आपको कुछ चाहिए। देख लो — कल आप बातचीत क्यों कर रही थीं? कुछ चाहिए था तभी ना। बात करने से मना किया गया था; कहती हो वही समझने के लिए बात की थी, तो उनसे क्यों समझना? उसके पीछे कुछ रसपान मिल रहा था, नहीं तो ऐसे क्यों बात करते? आप इनसे पूछ रहे हो कि ये मुझे कुछ बताएंगे, और ये उतनी दूर से मेरे पास आए हैं — ये बताने लायक होते तो मेरे पास क्यों आते? जब सीधा पूछ सकते थे तो वाया-वाया क्यों पूछे? और उस पूछने में आपका नियम भी टूट गया। समझ है, पर टिकती इसलिए नहीं कि मुझे कुछ चाहिए, अपने तरीके से — चाहे वह शब्द हो, दृश्य हो, रस हो, गंध हो, स्पर्श हो — समझ टिकती नहीं, वहां चली जाती है।
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वीडियो: हमारे अंदर कितनी अच्छाई है उतनी ही बुराई है क्या ? #livesatsang #yogiji_ka_satsang · 2025-04-19