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प्रश्नोत्तर P23-0023 · भाग 23

गुरु जी, ये साधनाएं, विधियां तो स्वयं को जानने के लिए करते हैं — मूल प्रश्न तो यही रहता है कि स्वयं को जानें।

कौन सी विधि से स्वयं को जान लोगे? बताइए, मुझे भी तो पता चले। अच्छा एक बात बताइए — स्वयं को जानने की क्या जरूरत है? कौन जानेगा स्वयं को? स्वयं तो है ही। जिसे जाना जा रहा है वो अलग है और जानने वाला अलग है — फिर तो आप वहीं के वहीं हो। यही तो अविद्या है, यही तो अज्ञान है। स्वयं को नहीं जानना है, जानने से मुक्त होना है। जब तक जानना है, तब तक द्वैत है — जानने वाला और जिसे जाना जाएगा। ईमानदारी-सत्कर्म तो मैंने कहा ना, आग है। ध्यान तो अपने आप आ रहा है, उसमें क्या सिखाओगे? सिखाना यह चाहिए — भैया, एक काम करो, जब काम करो तो इतना ध्यान रखना कि कोई गलती ना हो, बेईमानी-दुष्कर्म मत कर; इससे कुछ होगा। अब लोग ध्यान सिखा रहे हैं — ध्यान पत्ते पर जा रहा था, पत्ता छोड़ो, इस पर ध्यान लाओ — तो क्या हो जाएगा? एक व्यक्ति को जमीन से उठा के सोने के सिंहासन पर बैठा दिया, तो उसमें बदलाव आ जाएगा? और उसमें ताकत का उपयोग भी कर रहा है — जैसे एक रबड़ यहां बंधी है और आपने तेजी से खींचा, खींचते-खींचते छोड़ा, तो कहां जाएगी? मूल जगह पर। बचपन से मां कहती थी — ध्यान से खेलना बेटा; मतलब चोट ना लगे ऐसा खेलना। ध्यान से पढ़ना, ध्यान से लिखना। छोटा सा बालक संसार को नहीं समझ पाता, लेकिन समझ जाता था कि मां क्या कह रही है, पूछता भी नहीं था। काश ये बोल दिया गया होता कि बेटा, ध्यान से कर्म करना — और शाम को पूछती कि ध्यान से कर्म किया ना? तब बताता कि हां, मैंने ध्यान से कर्म किया — ईमानदारी से, सत्कर्म से, किसी का दिल नहीं दुखाया। ये पूछने वाला कोई नहीं था, और हम गलतियों पर गलतियां, अपराध पर अपराध करते गए। अब आध्यात्मिक नाम से गुरु मिल गए, बोले आओ हम तुम्हें ध्यान लगवाएंगे। कुछ समय के लिए बॉडी रिलैक्स होती है, घंटों बैठ जाओगे, ऐसा लगता है शरीर है ही नहीं; उठे, फिर वहीं के वहीं। मेन यह था कि जहां-जहां आपका ध्यान राग-द्वेष में जा रहा था, वहां से आपको निकालना था — राग-द्वेष हो क्यों रहा है, उसको जांचना; जांचने में ध्यान आ जाता है, और जांच के उस पर कर्म करना था। जैसे आपके घर में कोई मशीन बिगड़ गई — क्या उस पर देखने से वह ठीक हो जाएगी? नहीं, उसे खोल के ध्यान से देखना पड़ेगा कहां बिगड़ी है, कौन सा सामान खराब है, फिर वो लाकर लगाओगे तब जाकर वो बनेगी। वैसे ही पहले देखना है कि मैं कहां फंसा हूं, कहां उलझा हूं, कहां गलतियां कर रहा हूं — जब यह देख पाओगे, फिर आप निकाल लो, इतनी ताकत आप में है; लेकिन बिना देखे नहीं। अब यह देखना है कि आपको निकलना है कि रिलैक्स होना है।

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वीडियो: दर्शन से हमें क्या सीखना है ? #livesatsang #yogi Ji ka satsang · 2025-03-13