प्रश्नोत्तर P23-0041 · भाग 23
गुरु जी, अगर एक संन्यासी को अपना मातृ ऋण चुकाना हो, तो कैसे चुकाए?
मातृ ऋण होता ही नहीं; जरूरत पड़ने पर उनकी सेवा करो, बात खत्म। मातृ ऋण, पितृ ऋण और गुरु ऋण होता ही नहीं — बस जरूरत पड़ने पर उनकी सेवा करो। उनको भी उनके माता-पिता ने कहा, यह चली आ रही है। अब जैसे मैं आज यह ज्ञान दे रहा हूं, तो मेरी भी तो कहीं-कहीं प्रकृति गुरु बनी; तो यह ऋण नहीं होता। सबका अपना-अपना पद है और सबका अपने पद का काम है; ऋण नहीं होता। डरा के सेवा मत कराओ — लोग डरा के कराना चाहते हैं कि सेवा नहीं करोगे तो पाप लगेगा। डराओ मत, सीधा-सादा कहो: मात-पिता ने बचपन में आपका पालन-पोषण किया, उन्हें जरूरत पड़ने पर — अगर कोई भाई है तो ठीक है, नहीं तो — आप उनकी सेवा करो। अच्छा, मात-पिता छोड़ दीजिए; अगर आपके पास कोई ऐसा व्यक्ति रहा जिसका कोई नहीं है, और पता चला वो आप ही के यहां रह गया, तो उसकी भी सेवा करो। बात है जरूरत की; लेकिन यहां क्या है, डरा-धमका के करवाना चाहते हैं।
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वीडियो: दर्शन से हमें क्या सीखना है ? #livesatsang #yogi Ji ka satsang · 2025-03-13