आध्यात्मिक प्रत्यक्ष ज्ञान · ऐप में खोलें

प्रश्नोत्तर P23-0046 · भाग 23

गुरु जी, पहले भाव बनता है कि एकांत में जाएं, वहां हम अपनी साधना अच्छी तरह से कर पाएंगे; लेकिन जब एकांत मिलता है, सानिध्य मिलता है, तो वहां व्याकुलता होती है, भागने का मन होता है। ऐसा क्यों? हम एकांत को बर्दाश्त क्यों नहीं कर पाते?

इसलिए कि जब आप एकांत में जाते हो — एकांत का मतलब अपने आप में रहना — और जब आप अपने आप में रहते हो तो आपको चाहिए रसपान, और रसपान मिल नहीं पाता। शब्द, दृश्य, गंध, रस, स्पर्श — पांच इंद्रियों द्वारा आप रसपान करते रहते हो, और एकांत में जब वह नहीं मिल पाता तो एकांत से आप भाग लेते हो। एक-दो दिन तक एकांत अच्छा लगता है, इसके बाद आप ऊबने लगते हो, बोर होने लगते हो, घुटन होने लगती है, पीड़ा होने लगती है, फिर भाग जाते हो। एकांत में आने के बाद भी वह एकांत वास को तोड़ना चाहता है, फिर लोगों से रस भरी बातें करना चाहता है। अगर वो मिल जाए तो वहां रुक जाए और समझेगा कि मैं एकांत में हूं — तो एकांत रहा कहां? जब आपस में रस भरी बात कर ली, एक-दूसरे को देख के मुस्कुराने लगे, तो एकांत गया, राग हो गया। अगर आप एकांत में हो तो किसी को देख के कोई भी प्रतिक्रिया ना दो — शारीरिक और मानसिक — तब आप एकांत में हो। एकांत में वही व्यक्ति रह सकता है जिसे कुछ नहीं चाहिए। जिसे कुछ भी चाहिए वह एकांत को बर्दाश्त नहीं कर पाएगा। इसलिए तो मैं कहता हूं, कुछ नहीं चाहिए तो आना, समय बर्बाद मत करो — आपका भी समय बर्बाद होगा, सामने वाले का भी। अगर कुछ चाहिए तो पहले उसे पूरा कर लो, निपटा दो, नहीं तो एक-दो दिन में भाग जाओगे।

सत्संग वीडियो देखेंऐप में खोलें

वीडियो: हम एकांत को बर्दाश्त क्यों नहीं कर पाते हैं ? #live #pratyakshgyan #yogijikasatsang · 2025-03-07