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प्रश्नोत्तर P23-0072 · भाग 23

गुरु जी, अभेद होते हुए भी भेद क्यों लगता है? अभेद का मतलब एक जैसा, भेद का मतलब अलग-अलग — तो अंदर से सब एक जैसा है, लेकिन बाहर से तो अलग-अलग है ही?

यहां सब बैठे हैं — शरीर में तत्व वही है, लेकिन बाहर से रूप बदला हुआ है। यह रूप पहले नहीं था, बाद में नहीं रहेगा, लेकिन अभी तो है, तो हम रूप में फंसे हुए हैं। रसपान करना छोड़ दो, अभेद हो जाएगा, बात खत्म। दूर से देखा, फल की दुकान थी — सब फल दिख रहे थे। पास गए, दाम पूछा, बोले एक-दो किलो दे दो; उसने रखना चालू किया — मत डालो, यह कच्चा है, यह पक्का है, यह सड़ा है, यह बढ़िया नहीं है — अब हो गया भेद। पहले सब फल था, अब भेद हो गया। भेद तब होता है जब आपको चाहिए। और चाहिए में भी सबसे ज्यादा बंधन तब है जब अपने तरीके से चाहिए — तब राग-द्वेष हो जाता है। जब खुद की बारी आती है तब आदमी भेद पैदा करता है; दूसरे को देना है तो "ठीक है भाई"। अपने तरीके से चाहिए में भेद है, तो अपने तरीके से चाहिए का त्याग करो। जब तक आप अपने तरीके से रसपान कर रहे हो तब तक भेद रहेगा — भेद को ही कहते हैं द्वैत; और आप अपने तरीके से पाने से मुक्त हो गए तो हो गया अभेद, अद्वैत। बस यही है द्वैत-अद्वैत की परिभाषा।

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वीडियो: अभेद होते हुए भी भेद क्यों लगता है ? #livesatsang #livesatsangyogijika · 2025-03-07