प्रश्नोत्तर P23-0123 · भाग 23
गुरु जी, कुटिया में काम करते-करते शरीर एकदम थक गया और बीमार हो गया, तो रात को मैंने निर्णय कर लिया कि काम बीच में छोड़कर घर चली जाऊं ताकि आप मुझे बीमार देखकर और परेशान न हों; सुबह थोड़ा ठीक लगा तो निर्णय किया कि मैदान छोड़कर नहीं जाना। उस समय मेरी जीवात्मा का क्या हाल था — मैंने किसको महत्व दिया?
बात क्या है, पूरी तरह देखो। क्या 100% यह है कि मैंने सामने वाले के बारे में सोचा कि हम बीमार रहेंगे तो वह भी तकलीफ में आएगा? यह 100% है तब तो यह मानवता की बात है। और क्या इसके साथ यह भी है कि कहीं हम अपने आप को, अपने शरीर को बचाना चाहते थे? क्योंकि अभी तो हम शरीर से अलग हो नहीं पाए हैं। बुद्धि के लेवल से तो कह रहे हैं कि मैं अलग, शरीर अलग; लेकिन जब देश-काल-स्थिति-परिस्थिति में शरीर को तकलीफ होती है और हम शरीर का साथ देते हैं, तो इसका मतलब मैं शरीर ही हूं। अगर मैंने किसी काम को लिया है, किसी जिम्मेदारी को लिया है — मुझ पे किसी ने थोपा तो है नहीं — तो अधूरे में छोड़कर जाने की इच्छा कहां से प्रकट हुई? मैं इसी में मिट जाता। अगर मैं जा रहा हूं तो इसका मतलब मुझ में ताकत है; तो उस ताकत को मैं यहां उपयोग क्यों नहीं कर सकता? मैं अपने आप को बचाकर क्या करूंगा? पहले भी तो मैं स्वस्थ था, क्या कर लिया? स्थिति-परिस्थिति ही तय करवाती है कि आप किसमें लिप्त हो। जब तक आप स्वस्थ थे, अनुकूल परिस्थितियां थीं, तो आपने काम को महत्व दिया — पहले काम, बाद में मैं। अस्वस्थता में, तकलीफ में, विपरीत परिस्थितियों में आपने जिसे महत्व दिया, आप वही हो। देखना है कि विपरीत परिस्थितियों में मैंने शरीर को महत्व दिया, काम को महत्व दिया, या जिसके साथ हूं उसको महत्व दिया। अगर 100 में 101% यही है कि सामने वाले को दिक्कत न हो इसलिए जाना चाहता हूं, तब तो जाने से भी आपका स्तर उठ जाता। लेकिन अगर एक प्रतिशत भी अपने आप को बचाने का भाव था — कि मुझे आराम मिल जाए, काम तो होते रहेंगे — तो जाकर आप गिर जाते, और अच्छे तरीके से गिर जाते, क्योंकि फिर आपने अपने आप को महत्व दिया। तो मुझे देखना है कि मैं पूरी तरह क्यों नहीं मिट पाता? मैं हर बार अपने आप को ही क्यों बचाता हूं? मैं आखिर तक क्यों समर्पित नहीं हो पाता, बीच में क्यों डगमगा जाता हूं? शुरू में अगर आप उस लायक नहीं हो तो आपको लक्ष्य के लायक बनाया जाता है, धक्का मारा जाता है; लेकिन मैदान में उतरने के बाद आप भागते हो तो उसे भगोड़ा कहा जाता है, कायर कहा जाता है। फिर उस व्यक्ति को कोई धक्का नहीं मारता, क्योंकि पता चल जाता है कि यह बीच से ही भागेगा। शुरुआत में किसी भी काम में बहुत लोग होते हैं, देखा-देखी भीड़ बहुत चलती है, लेकिन आखिर तक कोई-कोई बचता है — और आखिर तक वही बचता है जिसने काम को महत्व दिया, अपने आप को नहीं। आप किसी कार्य में लगे हो तो 0.1 नहीं, 100% लगे हो, चाहे उसमें कोई भी काम मिल रहा हो। अब आपको देखना है कि क्या आप 100% उस काम में दे रहे हो।
सत्संग वीडियो देखेंऐप में खोलें
वीडियो: यह दर्द कभी तेरा भी था... #योगी · 2026-10-20