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प्रश्नोत्तर P23-0124 · भाग 23

गुरु जी, जीवात्मा जब बहुत दुखी होती है, जैसे लू में जल रही हो, तो इस तरफ भागती है; लेकिन जैसे ही थोड़ी छाया, थोड़ी राहत मिल जाती है, उसकी दबी हुई इच्छाएं निकल आती हैं और वह फिर उन इच्छाओं में भाग जाती है — लू में जो तपा रही थी, वह भूल जाती है। यह क्या माजरा है?

अपनी समझ का उपयोग करना है कि हम जब दुखी हुए, परेशान हुए, तो कोई मकसद लेकर आए थे। तो देखना यह है कि क्या मैंने उस मकसद पे पूरी तरह काम करके उस लक्ष्य तक पहुंच पाया, उस उद्देश्य को पूरा कर पाया? अगर मैं इतनी लू में जल रहा हूं तो देखना कि मैं इस गर्मी में घुसा कैसे? किसी ने फेंका तो है नहीं मुझे; कोई किसी को जबरदस्ती घुसा नहीं सकता। तो मैं कोई इच्छा, कोई लालच ही लेकर आया होगा। तपती लू में उस टाइम पे मुझे अपना पूरा बैकअप देखना पड़ेगा — तू यहां क्या करने आया? अब तेरे को छाया चाहिए, और जैसे ही छाया मिल जा रही है, फिर तेरे वही नाटक चालू हो जा रहे हैं। कल की घटना बता रहा हूं — एक महिला आई थी, उसका पति और बेटा भी। जब मैंने कहा कि वहां बैठ, तो वह जाने लगी; बेटा बोला मैं मम्मी के साथ ही जाऊंगा, बाप ने कहा तू रुक, फिर भी वह मम्मा के साथ ही गया। उस महिला ने कहा कि मैं समझ जाती हूं लेकिन ठहर नहीं पाती। तो मैंने कहा कि आप शब्दों से समझते हो। जैसे मैंने मैप देखकर या किसी से पूछकर सारा रास्ता समझ लिया कि यहां से यहां जाना है — तो क्या मैं लक्ष्य तक पहुंच गया? नहीं, अभी तो घर पे सोफे पर बैठकर बस देख रहा हूं। आपने समझा है, उस स्थिति में पहुंचे नहीं; उस स्थिति में पहुंचने के लिए यात्रा करनी पड़ेगी, काम करना पड़ेगा। फिर उसका कहना था कि जहां भी हम हैं, परमात्मा की वजह से हैं। तो बोला — जहां भी हो, परमात्मा की वजह से नहीं, अपनी मर्जी की वजह से हो। तुम यहां बैठी हो, तुम्हारा पति उधर घूम रहा है; कुछ देर पहले यही बेटा मम्मा-मम्मा चिल्ला रहा था, अब वही बेटा बाप के साथ खेत-खलिहान देख रहा है। तुम्हारी इच्छा ने तुम्हें मेरे पास बिठा रखा है, पति की इच्छा खेत-खलिहान देख रही है, बेटे को अब बाप के साथ कुछ मिल रहा है। वह अभी भी बाप के साथ नहीं है, अपनी इच्छाओं के साथ है। तो यहां सब अपनी-अपनी इच्छा से घूम रहे हैं। तो देखो कि आप जिसके लिए गए हो, उसे पूरी तरह क्यों नहीं कर पाते? गड़बड़ क्या है — आधे-अधूरे से भागना। शुरुआत करते हो, फिर बीच में से ही भाग जाते हो। बीच में से कभी नहीं भागना चाहिए। लक्ष्य की शुरुआत में आपकी स्थिति और रहेगी, धीरे-धीरे उस तरफ बढ़ोगे तो स्थिति और रहेगी; मुझे हर स्थिति-परिस्थिति में सिर्फ लक्ष्य दिखना चाहिए, चाहे मुझे अपने आप को मिटाना भी पड़े — मैं तो एक दिन मिट ही जाऊंगा। जिस शरीर को बचा रहे हो, वह शरीर पहले भी तो था, फिर भी दुखी थे। मैं बचाकर क्या करूंगा? स्वस्थ ही हो जाऊंगा तो क्या हो जाएगा? स्वस्थ होना है तो अपने लक्ष्य की तरफ बढ़ते हुए हो जाऊं, क्योंकि जिसको छोड़कर मैं गया, वह तो बहुत आगे निकल जाएगा; जहां से छोड़कर गए वहां वह मिलेगा नहीं, और जहां वह गया वहां तुम जा नहीं पाओगे। लक्ष्य को भूल गए और जहां गए वहां का कचरा ले आएंगे। लक्ष्य का चुनाव मैंने ही तो किया। मैं लक्ष्य की तरफ बढ़ रहा हूं तो भाग क्यों रहा हूं? भाग रहा हूं, इसका मतलब लक्ष्य के बहुत करीब हूं। मैं अपने शरीर को क्यों महत्व दे रहा हूं? इसका मतलब अभी मैं शरीर ही हूं, तभी तो अपने आप को बचा रहा हूं। अनुकूल परिस्थितियों में तो कह देता हूं कि मैं और शरीर अलग, लेकिन विपरीत परिस्थितियों में मैं ही शरीर हूं।

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वीडियो: यह दर्द कभी तेरा भी था... #योगी · 2026-10-20