प्रश्नोत्तर P23-0126 · भाग 23
गुरु जी, रात को मैं कहती हूं कि जाऊंगी और सुबह कहती हूं कि नहीं जाऊंगी — घर, सुविधाएं सब हैं, लेकिन होश में आती हूं तो कहती हूं कि वह भी नहीं चाहिए। यह द्वंद्व क्यों है? मेरे अंदर दृढ़ता क्यों नहीं आ रही, मैं बार-बार डगमगा क्यों जाती हूं?
यहां आश्रम बनाने का मेरा कोई संकल्प नहीं था; संकल्प अंदर से निकला, वह चाहे परमात्मा का हो चाहे जिसका भी हो। मेरा बस इतना कहना है कि अब यहां कुटिया बन गई है, यहां कोई भी साधक साधना करने आए, बस उसका आत्मिक कल्याण हो। आपकी भाभी ने कहा कि यह बहुत समझदार है। मैंने कहा — मुझे नहीं लगती। अगर तू इसलिए समझदार मानती है कि यह सब काम कर लेती है, तो ये सब काम तो पैसे से भी करवाए जा सकते हैं; इसके पहले भी मैं काम कर चुका हूं। मैं समझदार उस दिन मानूंगा जिस दिन यह उस परम स्थिति को उपलब्ध हो जाएगी; उसके पहले नहीं कह सकता। और यह भी बात है कि यही काम करते-करते यह उस स्थिति तक पहुंचेगी; इसको काम करना भी पड़ेगा, अगर काम न करे तो पहुंच भी नहीं पाएगी। इस दुनिया में कोई साधना करके पहुंचता है — मैं साधना करके पहुंचा — कोई सेवा करके पहुंचता है; किसी में साधना का गुण होता है, किसी में सेवा का। साधना में भी स्थिति ऐसी रहती है — मेरे पांव इतने सूजे रहते थे, रात को पैर फटते थे, नींद नहीं आती थी; पैरों में चप्पल डालते-डालते आंसू आने लगते थे, उसके बाद भी मैं 20-30 किलोमीटर चलता था। लोगों ने कहा दवा लगा लो; मैंने कहा पैर कट भी जाएंगे तो दवा नहीं लगाऊंगा, क्योंकि मैं आखिरी यात्रा पे हूं। तो चाहे आप साधना करो, चाहे सेवा करो — आपको डर को पार करना पड़ेगा, मृत्यु को चुनना पड़ेगा, तभी आप पार कर पाओगे। जब तक अति नहीं होगी, वह डर, वह संशय छिपा रहता है — इतने सूक्ष्म रूप से कि तुम्हें भी नहीं दिखता, जैसे बहुत सी चीजें खुली आंखों से नहीं, लेंस से दिखती हैं। ये कब दिखते हैं? जब विपरीत परिस्थितियां आती हैं। दिखेंगे, तभी तो नाश होगा; देख नहीं पाओगे तो नाश भी नहीं होगा। जब वह डर दिखे तो देखना है कि आप किसे महत्व देते हो — डर को या लक्ष्य को। कई बार ऐसी परिस्थितियां आएंगी कि अगर हम ऐसे ही करते रहे तो खत्म हो जाएंगे; लेकिन उस खत्म होने में भी मैं तो हूं, मेरा लक्ष्य तो है। इच्छा का नाश तभी होगा जब विपरीत परिस्थितियां बनेंगी। शरीर को बचाना चाहता हूं, इसका मतलब शरीर से कुछ करना चाहता हूं। इच्छा है तो डर है, डर है तो इच्छा है; और जब तक डर है तब तक वह परम स्थिति नहीं मिलेगी। डर इसलिए आता है कि अगर यह शरीर ही निकल गया तो मेरी इच्छाएं कैसे पूरी होंगी, मैं भोगूंगा कैसे। साधना करते-करते या सेवा करते-करते स्थिति यह बनेगी कि आगे मौत ही है, और मौत हो भी सकती है; लेकिन मौत भी हो जाएगी तो अगला शरीर वहीं से मिलेगा, यात्रा से पार करके मिलेगा। ऐसी स्थितियां बनेंगी कि आगे बढ़े तो मर जाएंगे, पीछे गए तो बच जाएंगे — उस समय क्या फैसला होता है, वह क्षण मायने रखता है। जीवन को चुना तो आपने इच्छा को चुना; मृत्यु को चुना तो आपने लक्ष्य को चुना — कोई बात नहीं, मर जाएंगे लेकिन करने में मरेंगे। मैं इससे गुजर चुका हूं, मेरे साथ कई बार हुआ है और हर बार मैंने पार किया है; मैं कभी पीछे नहीं हटा, मेरे लिए पीछे तो था ही नहीं, सिर्फ आगे था, चाहे जीवन हो चाहे मृत्यु। अभी इससे भी भयानक स्थिति बन सकती है, क्योंकि जैसे-जैसे आप लक्ष्य के करीब होते हो वैसे-वैसे थकते हो — जैसे एक किनारे से दूसरे किनारे जा रहे हो तो दूसरे किनारे तक पहुंचते-पहुंचते डूबने लगते हो। अब देखना है कि डूबने में आप आगे की तरफ हो या वापस की तरफ। वापस जाने में दिमाग में बैठा है कि कंफर्ट जोन में पहुंच जाऊंगा, पर ताकत बची नहीं, वहां तो निश्चित डूब जाएगा; आगे नहीं भी पहुंचे तो मुंह तो मंजिल की तरफ है, कायर, डरपोक तो नहीं कहलाऊंगा। हर बात मैं इसलिए बताता हूं कि मैं गुजर चुका हूं। आपका धन-दौलत, पैसा, टैलेंट, व्यवस्थाएं सब धरी की धरी रह जाएंगी; आपके साथ एक घुटन होगी, क्योंकि आप कुछ पार कर रहे हो — यही तो तपस्या है। बस अपनी बनाई हुई हर धारणा को तोड़ना है और लक्ष्य को कभी नहीं छोड़ना है; कोई भी स्थिति-परिस्थिति आ जाए, उसके लिए तैयार रहना है। जैसे-जैसे आगे बढ़ोगे, वैसे-वैसे विपरीत परिस्थितियां आनी ही आनी हैं।
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वीडियो: यह दर्द कभी तेरा भी था... #योगी · 2026-10-20