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प्रश्नोत्तर P23-0125 · भाग 23

गुरु जी, शरीर इतनी पीड़ा दे रहा है कि खाया-पिया भी नहीं जा रहा और काम भी अलग-अलग तरह का बहुत है, जो टाला भी नहीं जा सकता। मुझे लग रहा है कि शायद यह मेरा आखिरी कवच है जो टूटना बाकी है। अगर मैं मैदान छोड़कर घर जाकर ठीक हो जाऊं, फिर दोबारा लग जाऊं तो?

कोई भी हो, टूट तो रहा ही है। अगर हम इसमें लगे हैं तो इसका मतलब मैं आगे ही बढ़ रहा हूं — कुछ तो टूट रहा है और हम आगे बढ़ रहे हैं। जब मैं इस संकल्प को पूरा करने निकल रहा था तो मैं आप लोगों को मना कर रहा था कि आप लोग मत चलो, इतना आसान नहीं है। मैंने कहा भी था कि हो सकता है हमें किनारे सोना पड़े, भूखा रहना पड़े; तो आप लोगों ने कहा कि हम हर स्थिति में रहेंगे। अगर आप मेरे साथ हो तो आपके साथ मैं भी हूं; मैं लक्ष्य के साथ भी हूं, आपके साथ भी हूं। लेकिन मैंने कभी भागने का नाम लिया? मैं भागूंगा कहां? आपको लगा कि वहां मुझे आराम मिल जाएगा, लेकिन मेरे तो काम में ही मुझे आराम है, चाहे जैसी भी स्थिति-परिस्थिति बन जाए। यह पैसा, व्यवस्था कोई काम नहीं आएगा — मुझे मालूम था; आखिर में तो यह शरीर ही हथियार है। आप वहां जाओगे अपने आप को बचाने, तो आपका शरीर स्वस्थ हो जाएगा लेकिन आप बीमार हो जाओगे; और अगर आप अपने लक्ष्य की तरफ रहे तो आपका शरीर बीमार हो सकता है लेकिन आप स्वस्थ हो जाओगे। मुझे मालूम था किन-किन परिस्थितियों का सामना करना पड़ेगा, क्योंकि मैं कर चुका हूं — भोजन सामने रहेगा, तुम खा नहीं सकते; पानी सामने रहेगा, पी नहीं सकते; कुर्सी सामने रहेगी, बैठ नहीं सकते; बिस्तर सामने रहेगा, सो नहीं सकते। इसीलिए मैं सचेत कर रहा था। तो आपको यह जांचना है कि जब मैं सब कुछ स्वीकार करके चला, सामने वाला भ्रमित करके नहीं लाया, स्वेच्छा से आया, तो मुझे दो बार ऐसा भाव क्यों आया? इसमें भागने से अच्छा न आना ज्यादा ठीक है, क्योंकि भागने में फिर व्यक्ति गिर जाएगा और जिंदगी में मौका भी उसे नहीं मिलेगा। जो चला ही नहीं, वह कभी न कभी चल पड़ेगा, कभी न कभी उसके ऊपर भरोसा किया जाएगा; लेकिन बीच में अगर कोई भाग गया तो उस पे दोबारा भरोसा नहीं होगा, क्योंकि पता है कि यह बीच से ही भागेगा, यह ताप सहन ही नहीं कर पाएगा। अब आपको सूक्ष्म तरीके से देखना है कि आखिर दो बार ऐसा भाव मेरे अंदर क्यों पैदा हुआ।

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वीडियो: यह दर्द कभी तेरा भी था... #योगी · 2026-10-20