आध्यात्मिक प्रत्यक्ष ज्ञान · ऐप में खोलें

प्रश्नोत्तर P23-0128 · भाग 23

गुरु जी, जैसे बच्चा टॉफी की जिद करता है और मां जानती है कि इससे उसके दांत सड़ेंगे, तो वह उसे धीरे से दूसरे ऑप्शन में लगा देती है — क्या गुरु भी ऐसे नहीं कर सकते?

वह बालक अबोध है, लेकिन यहां साधक अबोध नहीं है; उसे अच्छे-बुरे दोनों का ज्ञान है, इसके पास पूरी समझ है। तभी तो यात्रा करने आया; अगर समझ कम होती तो यात्रा करने आता ही नहीं, इसी संसार में पड़ा रहता। अगर यह अपने स्व की यात्रा करने आ गया तो इसका मतलब इसकी समझ विकसित हो गई है; अब इसके निर्णय पे ही काम किया जा सकता है। अगर इसके निर्णय पे काम नहीं करेंगे तो हो सकता है बहुत देर बाद भागे, क्योंकि इसने इच्छा बना ली है। जब मानसिकता बन गई कि मैं उस जगह ठीक हो जाऊंगा, और अगर हम उसे रोक लें तो वह और परेशान हो जाएगा; तो जा, उस जगह ठीक होकर आ जा — लेकिन ठीक होकर आने में, जिस लक्ष्य में तू था, उससे तो बहुत पीछे रह गया, वह तो बहुत आगे निकल जाएगा। यहां का कोई काम रुकता नहीं; आप हो तो भी नहीं रुकेगा, नहीं हो तो भी नहीं रुकेगा। अपनों की कुटिया में कितने लोग आए-गए, कोई काम रुका? जिसको रहना है रहे, जिसको जाना है जाए। जब यह पूछा जाता है कि मैं क्या करूं, तब गुरु उचित मार्ग बताता है। जब उसने खुद फैसला ही कर लिया कि मुझे यह करना है, तो उसने गुरु को महत्व ही नहीं दिया, क्योंकि फैसला ही सुना दिया। अपनी जिंदगी का वह खुद मालिक है। जिसके सानिध्य में मैं हूं, वह तो आपको कुछ होने ही नहीं देगा; आप सबसे ज्यादा उसी के पास सुरक्षित हो। लेकिन अगर आपको लगा कि यहां नहीं, वहां सुरक्षा है, तो ठीक है, जाके देख लो; रोक भी नहीं सकते, क्योंकि तुमने निर्णय कर लिया। उसे पता है कि वहां तुम और असुरक्षित हो जाओगे, लेकिन अब रोक नहीं सकते। तो देखना है कि किस भाव में मैंने शब्दों को रखा है, वैसे ही हमें जवाब मिलेंगे। जो चीज मेरे भाव से निकली, इसका मतलब मैं वहीं पे हूं; विपरीत परिस्थितियों में आदमी जहां होता है वहीं का फैसला लेता है। अनुकूल नहीं, विपरीत परिस्थितियां ही व्यक्त करती हैं कि आपकी स्थिति क्या है। विपरीत परिस्थितियां बननी ही बननी हैं, लेकिन अपने को आगे ही रखना है — चाहे जिएंगे, चाहे मरेंगे, लक्ष्य के साथ। लक्ष्य को महत्व दो, क्योंकि लक्ष्य में आप हो; लक्ष्य गया तो सब गया, मतलब आपने अपने आप को खो दिया। जैसे एक बार टॉर्च जलाई, जहां तक दिखा वहां तक देखा, बुझने के बाद वहीं आ गए — एक बार अगर आप लौट आए तो उससे भी ज्यादा नीचे गए; जितनी तेजी से आप इधर जा रहे थे, उतनी तेजी से फिर नीचे जाओगे, क्योंकि आपके अंदर एक ताकत आ गई है, अब वह ताकत गिरने में उपयोग होगी। तो ध्यान रखना है कि कोई भी स्थिति-परिस्थिति आ जाए, मुझे लक्ष्य की तरफ ही आगे बढ़ना है, वही काम करना है जो मुझे लक्ष्य की तरफ ले जाए, क्योंकि लक्ष्य का चुनाव मैंने किया है। और जिसके सानिध्य में हैं, उसके सामने अपनी बात किस भाव में रख रहे हैं — अगर निर्णय करके रखा, तब तो बात ही खत्म कर दी; बात ऐसे रखो कि मेरी स्थिति यह हुई है, मैं क्या करूं, मुझे क्या करना उचित होगा।

सत्संग वीडियो देखेंऐप में खोलें

वीडियो: यह दर्द कभी तेरा भी था... #योगी · 2026-10-20