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प्रश्नोत्तर P23-0130 · भाग 23

गुरु जी, तो क्या मैं रास्ते में चलते-चलते रोज अपने आप को चेक करती रहूं कि अब तुझे क्या चाहिए, ताकि 99 पर जाकर फिर "चाहिए" न बोल दूं?

चलने से पहले ही पक्का कर लो कि तुम्हें फाइनली क्या चाहिए। चेक नहीं करना है। मेरी तो अनंत इच्छाएं हैं; मुझे किसी इच्छा को महत्व नहीं देना है, क्योंकि ये सब इच्छाएं मैंने भोग ली हैं। जैसे-जैसे आगे जाओगे, वैसे-वैसे इच्छाएं उठेंगी, और वैसे-वैसे पूरी करने की सामर्थ्य भी आएगी — दोनों बातें। ऐसे बैठकर सोचोगे कि क्या इच्छाएं हैं, तो वे दिखेंगी भी नहीं। वे अंदर दबी हुई हैं; जैसे-जैसे आगे जाओगे, जैसे-जैसे ताकतवर होगे, वे जन्म लेंगी। एक समय ऐसा था कि वह इच्छा पूरी नहीं कर पा रहे थे, लेकिन अब वह बड़ी आसानी से पूरी हो जाएगी, सारे ऑफर सामने आ जाएंगे — और वह आसानी से इच्छा पूरी करने में फिर गिर जाओगे। जब खाने को कुछ नहीं था तो उपवास कर लिया; अब खाने को इतना सामान है। तो किसी भी इच्छा को महत्व नहीं देना है। देखना यह है कि आप किसे महत्व देते हो — इच्छाओं को पूरा करते हो, तब तो आप वहीं गिर गए; या इच्छाओं को छोड़कर आगे ही बढ़ जाते हो। ऑप्शन कभी मत पकड़ो। जिसके लिए निकले हैं, सिर्फ वही करेंगे, उसके अलावा कुछ नहीं। अगर कुछ और करूंगा तो तभी, जब वह मेरे लक्ष्य तक पहुंचने में सहायक होगा, नहीं तो नहीं — इतना पक्का करके चलोगे तभी आप पहुंच पाओगे। यह बड़ा सूक्ष्म है, बहुत सूक्ष्म; होश भी उतना चाहिए, तत्परता भी उतनी चाहिए। यहां अगर आप बीमार भी पड़े हो तो भी लक्ष्य की तरफ हो — कम से कम रास्ता तो चेंज नहीं करो। अगर आप जिनके साथ हो उन्हीं के साथ रहते, तो जितनी तेजी से वे आगे जा रहे हैं उतनी तेजी से आप भी जा रहे हो, भले आपके द्वारा कुछ नहीं हो रहा, आप बिस्तर पे ही पड़े हो। ऐसा तो है नहीं कि घर में रहने वाला बीमार नहीं होता; डॉक्टर के पास रहने वाले भी बीमारी से जूझ रहे हैं। तो सोच-बूझ, समझ के साथ आगे बढ़ो।

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वीडियो: यह दर्द कभी तेरा भी था... #योगी · 2026-10-20