आध्यात्मिक प्रत्यक्ष ज्ञान

प्रश्नोत्तर P24-0033 · भाग 24

गुरु जी, स्वयं का परिचय — आत्म परिचय क्या है?

आत्म परिचय का मतलब — जो था, है और रहेगा सदैव, उसका परिचय। हर काल में वो मौजूद है; अगर आपने उसका परिचय कर लिया तो आत्म परिचय है। बाकी हमारा जो बनाया हुआ परिचय है, वह बदलता रहता है। हमारा परिचय लोगों के लिए है — कभी शरीर के नाम से कोई जानता है, कोई हमारे कर्म से; जैसे-जैसे हमारा कर्म बदलता है वैसे-वैसे हमारा परिचय लोगों के लिए बदलता रहता है। देश, काल, स्थिति, परिस्थिति में हमारा परिचय बदलता रहता है। लेकिन वह परिचय रहेगा नहीं, चला जाएगा। अब उस परिचय में हमारा अहम भाव होता है कि मैं यह हूं — उसी में व्यक्ति फंस जाता है। जब वहां से आप अहम भाव हटाओगे, तब अपना आत्मनिरीक्षण करोगे — मैं क्या हूं? कहां से आया हूं? कहां जाऊंगा? जन्म क्या है? मृत्यु क्या है? अपने बनाए हुए अस्तित्व को जब आप देख लोगे कि ये तो बनाया हुआ अस्तित्व है, ये रहेगा नहीं, मैं इसे कितना भी रखना चाहूं — पहले नहीं था, अब बस अहम भाव में है कि मैं कुछ बन गया हूं — तब आप उससे छुटकारा पाना चाहोगे; और एक तरफ यह जानना चाहोगे कि आखिर मेरा वो अस्तित्व कौन सा है जो था, है और रहेगा। इसी को कहते हैं आत्मनिरीक्षण। अभी प्रत्यक्ष नहीं हुआ है, लेकिन किसी के ज्ञान को सुनकर शब्दों से प्रत्यक्ष हो गया है कि ये नहीं रहेगा। तो आत्मनिरीक्षण करते-करते, एक तरफ बाहर से अपने आप को छुड़ाओगे, एक तरफ अपने आप को समझोगे, तो धीरे-धीरे एक समय ऐसा आएगा कि आत्म साक्षात्कार हो जाएगा। आत्म साक्षात्कार किसको होगा? साक्षात्कार करने वाला नहीं रहेगा — करते-करते निर्णय करने वाला खत्म हो जाएगा। जिस समय उसे निर्णय करने के लिए कुछ भी नहीं रहेगा, उसके बाद होगा साक्षात्कार। जैसे किसी के घर पता लेके गए — जैसे ही पते पर पहुंचे, पता खत्म, सारा भ्रम खत्म। जिसकी मांग थी कि मुझे आत्म साक्षात्कार करना है, वो खत्म हो गया; आत्म रह जाएगा — जो बचा, वो आप हो। ये थोड़ा कठिन है, इसे धीरे-धीरे समझो, जल्दी मत करो।

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वीडियो: आत्म परिचय क्या है ?#yogijikasatsang #आध्यात्मिकप्रत्यक्षज्ञान #प्रत्यक्षज्ञान #साधना · 2026-07-06