प्रश्नोत्तर P24-0041 · भाग 24
गुरु जी, 'मैं था तब हरि नहीं, हरि है तो मैं नाहीं' — जब आप कबीर साहब को मानते ही नहीं, तो उनकी वाणी बोलने का आपको क्या अधिकार है?
किसने कहा कि हम कबीर को नहीं मानते? जो महापुरुष होते हैं, वो व्यक्तिगत नहीं होते। जरूरी नहीं है कि मैं आपको बोलूं — मैं कबीर को मानता हूं, बुद्ध को मानता हूं, मीराबाई को मानता हूं, गुरु नानक जी को मानता हूं; ये कहने की आवश्यकता नहीं है। जब मैं यह काम कर रहा हूं, मतलब इन लोगों का सम्मान करता हूं, तभी तो मैं यहां तक आया। यह चिल्लाने की जरूरत नहीं है — प्रेम कभी चिल्लाया नहीं जाता। और कबीर की वाणियों को हमें मान के लिए बेचना नहीं है, उनकी वाणी लेके व्यापार नहीं करना है — समझना है। कबीर की वाणी हो, चाहे बुद्ध, महावीर, मीराबाई की — यह किसी एक व्यक्ति की नहीं है; उस वाणी में जीना पड़ता है, चिल्लाने से कुछ नहीं होता। बुद्ध, महावीर, कबीर, मीराबाई, गुरु नानक, ज्ञानेश्वर जी — इनको मानने की जरूरत नहीं है, इनके शब्दों को समझने की जरूरत है और उसमें जीना पड़ेगा। मानने से कुछ नहीं होगा — इनको मानो और दिन भर जेब काटो, इनके शब्दों को उठा के मार्केट में बेचो, मान कमाओ, चौराहे पे बोल के गप मारो — यही हो रहा है आजकल। हमने इनको समझा है, तभी मैं आज यहां तक पहुंचा हूं।
सत्संग वीडियो देखेंऐप में खोलें
वीडियो: आत्म परिचय क्या है ?#yogijikasatsang #आध्यात्मिकप्रत्यक्षज्ञान #प्रत्यक्षज्ञान #साधना · 2026-07-06