आध्यात्मिक प्रत्यक्ष ज्ञान

प्रश्नोत्तर P24-0042 · भाग 24

गुरु जी, ईश्वर तो तीन गुण और 25 प्रकृति से परे है; तब माया नहीं बनी थी — तब ईश्वर कहां था?

ये वही बताएगा जिस किताब से पढ़े हो; उस किताब में नहीं लिखा था, नहीं तो वो भी बता देते कि ईश्वर कहां है। आज तक दुनिया में जितना भी लिखा गया, जितना भी बोला गया, उसमें बस अधूरापन ही है; किसी ने पूर्ण लिखा ही नहीं, लिखा ही नहीं जा सकता। एक पेड़ के बारे में लिख सकते हो? लिखते-लिखते, देखते-देखते पेड़ ही बदल जाएगा। शरीर के बारे में लिखो तो खुद बदल जाओगे। कुछ भी पूर्ण लिखा-बोला नहीं जा सकता, क्योंकि लिखने-बोलने वाला ही पूर्ण है, और उसने अपने आप को अपूर्ण में फंसा लिया है; वो जब भी करेगा तो अपूर्ण ही करेगा, अपूर्ण की ही बात करेगा। खुद है पूर्ण और उसकी ख्वाहिश है पूर्ण लिखने की। अरे भाई, आप कुछ भी करोगे तो अपने से कम ही करोगे, ज्यादा कैसे कर पाओगे? ये हर क्षेत्र में लागू होता है — जब भी काम करोगे, अपनी क्षमता से कम ही करोगे। इसीलिए इच्छा करना मूर्खता बोला गया — इच्छा करना ही सबसे बड़ी मूर्खता है। मानसिक रूप से आप जो भी करोगे, आपसे कम ही सामने होगा, इसलिए वो अपूर्ण ही रहेगा हमेशा; लेकिन उसको हम लोग पूर्ण मान चुके हैं कि यही पूर्ण है — यही तो गड़बड़ है। ये चिंतन करने का विषय है।

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वीडियो: आत्म परिचय क्या है ?#yogijikasatsang #आध्यात्मिकप्रत्यक्षज्ञान #प्रत्यक्षज्ञान #साधना · 2026-07-06