प्रश्नोत्तर P24-0105 · भाग 24
गुरु जी, मैं 2003 से इस लाइन में हूं, दीक्षा ली, गुरु मंत्र लिया, अब ज्ञान का मार्ग पकड़ा है। लेकिन अभी भी हम एक पैर उस नाव में और एक पैर इस नाव में रख रहे हैं, तो गिरना ही संभव लगता है। आपके जैसी स्थिति कब और कैसे आएगी?
लेकिन उधर क्यों गिरना? इधर ही गिर जाओ। अगर गिरना ही है — जब एक कदम उधर है, एक कदम इधर है — तो एक कदम इधर से खींच के उधर क्यों ले जा रहे हो? उधर से खींच के इधर ही लाओ ना। स्थिति आएगी तेरे प्रयास से। धीरे-धीरे प्रयास कर, प्रयास करेगी तो होगा। इस मार्ग के जितने मार्गी हैं, जिज्ञासु हैं, सत्य के खोजी हैं — बस इन पे मैं काम करता हूं, इनके अलावा मेरा कोई नहीं। मेरी जिंदगी इन्हीं लोगों के लिए है; चाहे दिन हो चाहे रात हो, मेरा हर क्षण, हर पल इन्हीं लोगों के लिए है। प्रयास कर, जरूर हो जाएगा। यह तो होना ही है, क्योंकि अपने आप में ही है ना। बस मैं जहां हूं वहां से निकल जाऊं, तो हो ही जाएगा। यह उपलब्धि लानी भी नहीं है। मैं जहां लिप्त हूं, बस वहां से अपने आप को निकाल लूं। मुझे निकलने के लिए प्रयास करना है, ना कि उपलब्धि के लिए। मैं जहां-जहां उलझा हूं, जहां-जहां फंसा हूं, जहां-जहां राग, द्वेष, मोह, आसक्ति, इच्छा, अपेक्षा, मेरा, कर्ता का भाव है — वहां से मैं अपने आप को निकालूं। जब तक तू सब कुछ छोड़ेगी नहीं, विचार नहीं छोड़ेगी, तब तक नींद भी कैसे आएगी? वही हमारा ज्ञान भी है — ज्ञान में भी तो सब कुछ छोड़ना है, तो अपने आप प्राप्त होगा। फेंक दे बस। यह समझ ले कि तेरी यही पहली और आखिरी जरूरत है; उपलब्धि तो — इतनी ताकत तुम में है कि तुम करवा लोगी।
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