प्रश्नोत्तर P24-0162 · भाग 24
गुरु जी, क्या आत्मज्ञानी प्रिय-अप्रिय में, निंदा-स्तुति में, मान-अपमान में और मित्र-शत्रु से भी समान व्यवहार रखता है?
वो व्यवहार से मुक्त रहता है; उसे व्यवहार से मतलब ही नहीं है। वो व्यवहार में जीता ही नहीं, वो सिर्फ अपनी जिंदगी जीता है। चाहे कोई खुश हो जाए, चाहे नाराज हो जाए — उसे मतलब ही नहीं है। वो आपको रुठाने भी नहीं आएगा और मनाने भी नहीं आएगा।
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वीडियो: साधना में आसन की शुद्धता का क्या महत्व है ? #yogijikasatsang #प्रत्यक्षज्ञान #साधना #आध्यात्म · 2026-09-08