प्रश्नोत्तर P24-0173 · भाग 24
गुरु जी, आपकी यात्रा में कई बार ऐसा समय आया होगा जब मन ने या पूर्व के संस्कारों ने जोर मारकर आपको रोकना चाहा होगा। तब आपने किसका सहारा लिया या क्या प्रयोग किया?
मैंने हमेशा बस एक बात याद रखी कि यह फैसला तेरा ही है, तुझे पीछे नहीं जाना। सब लोग मना कर रहे थे और तुमने यह फैसला लिया है, इसलिए तुम्हें पीछे नहीं जाना। या तो खोज लेंगे या खोजते हुए मर जाएंगे — बस यही थी अपनी जिंदगी; पीछे कुछ था नहीं मेरे लिए। खोज लिए तो जीवंत हो गए। हर व्यक्ति ने मुझे मना किया, यहां तक गुरु ने भी मना किया — बोला खाओ-पियो, पड़े रहो, भजन करो। हम कहे ना, हम खोज में निकले हैं, भजन के लिए नहीं; मैं खोज करने निकला हूं, खोज के ही रहूंगा, चाहे कुछ भी हो। मैं किसी से पूछने भी जाता था तो कहता था — मेरी योग्यता है या नहीं, ये नहीं पूछ रहा; मुझे पता है मेरी योग्यता है। आगे का रास्ता मालूम हो तो बताओ, नहीं तो बात खत्म, हम आगे जाएं। मैं सही जगह हूं या गलत जगह — इससे क्या फर्क पड़ता है? मैं सही आदमी या बुरे आदमी की, सही या गलत जगह की खोज नहीं कर रहा था; मैं अपनी खोज कर रहा था। तुम क्या करते हो, उससे मुझे मतलब नहीं। और कोई कुछ भी पकड़ा दे, ऐसे थोड़ी पकड़ लेंगे — मुझे क्या चाहिए, कैसा माल चाहिए, उसका ज्ञान मुझे है। अगर तुम्हें क्या चाहिए इसका ज्ञान नहीं है, तो वहीं पड़े रहते — कोई बोल देता भजन करो, 10 साल में भगवान मिल जाएगा, तो 10 साल भजन करते बैठे रहते।
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