प्रश्नोत्तर P24-0193 · भाग 24
गुरु जी, मुझे करोड़ों मिल भी जाएं, तो मैं उतना ही खाऊंगी, उतना ही पहनूंगी। मान-इज्जत मिलेगी, अहंकार पोषित होगा, और साथ में भय भी — चोर, इनकम टैक्स, दुश्मन। ये दोनों चीजें मुझे दिख रही हैं, वहां मैं रह भी नहीं पा रही। फिर भी जन्मों-जन्मों का अभ्यास है — उसका क्या करूं?
हर अभ्यास में तो आप ही थे। तो अब करने में अभ्यास किए, तो छोड़ने में अभ्यास लगाओ। छोड़ना आपको पड़ेगा, यही रास्ता है। फैसला आपको लेना पड़ेगा — पांच से दस बनाना है, दस से बीस बनाना है, या छोड़ के निकलना है। यह फैसला आपको ही लेना पड़ेगा, क्योंकि आप स्वतंत्र हो, कर्ता का अधिकार है। देखिए, शुरुआत में जब कोई विद्यार्थी एडमिशन लेता है, तो स्कूल फैसला करता है कि कौन से विषय पढ़ेगा। एक समय आता है कि विद्यार्थी को मौका दिया जाता है कि आप कौन से विषय पढ़ना चाहते हो। अब वो कहे मुझे नहीं पता — तो स्कूल फैसला नहीं दे सकता; अगर यह फैसला आप नहीं कर पाओगे तो कॉलेज में आपका एडमिशन नहीं होगा। तो यह फैसला आपको लेना है कि बहिर्मुखी यात्रा करनी है या अंतर्मुखी। बहिर्मुखी करनी है तो ऐसे लोग मिलेंगे, अंतर्मुखी करनी है तो वैसे लोग मिलेंगे। आपको यात्रा कोई करवा नहीं सकता, ये अधिकार किसी को नहीं दिया गया। बहिर्मुखी में कुछ मिलेगा, उसका नाश होगा। अंतर्मुखी में कुछ नहीं मिलेगा — आखिर में खोजने वाला ही मिलेगा। बहिर्मुखी छोड़ दिया, फिर जब अंतर्मुखी भी छूट जाएगा तो वह बचेगा, शेष। मिलने से मुक्त हो जाएगा। मिलना ही भटकाव है, उम्मीद ही भटकाव है — इसलिए संपन्न होके पड़े रहो।
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वीडियो: अंतर्मुखी कैसे हो ?अंतर्मुखी होने का रहस्य । #yogijikasatsang #आध्यात्मिकप्रत्यक्षज्ञान · 2026-05-27