प्रश्नोत्तर P3-0106 · भाग 3
जैसे अभी वृद्ध लोग आश्रम में आएंगे, जैसे अपने प्रोफेसर साहब — धीरे-धीरे उम्र और बढ़ेगी और ये यहीं रुकेंगे, तो फिर उनकी सेवा कौन करेगा?
क्या फर्क पड़ता है, उनको तो मिटना है। भोजन करते-करते अगर कोई रहा तो सेवा करेगा, नहीं तो तड़पकर निकल लेंगे, या वही शरीर सड़ जाएगा तो निकल लेंगे। मैं आपको बताऊं — मेरा अगर शरीर अभी खराब हो जाए तो मुझे एक गिलास पानी देने वाला कोई नहीं है; कोई आ जाए वह बात अलग है।
समझना इस बात को — आप लोग कितने दिन दोगे, एक महीना, दो महीना? क्योंकि आपके पीछे भी तो कोई है। आपके लिए पक्का व्यक्ति है — आपका बेटा, आपकी पत्नी — वे पूरी जिंदगी देंगे, चाहे मान से दें, चाहे सम्मान से, चाहे अपमान से। लेकिन इस व्यक्ति के लिए पक्का कोई नहीं; आप कितने दिन दोगे? तो जब हमने अपनी फिक्र नहीं की, तो प्रोफेसर साहब की फिक्र क्या करूं? हमारे पीछे तो कुछ भी न था, न है, न होगा — हम तो सिर्फ हम ही हैं।
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