प्रश्नोत्तर P3-0107 · भाग 3
एक साधक ने अनुभव बताया: दीपावली पर पूजा के लिए रखी नए नोटों की गड्डी सत्संग सुनकर निकाली और एक जरूरतमंद को नया नोट दिया, तो देने और लेने दोनों में भाव बहुत पवित्र हुए। फिर प्रश्न — घर या आश्रम में जाकर दान लिखवा आते हैं, तो वह सत्कर्म में आता है या किस कर्म में? (हमारा किराने का बिजनेस है, ज्यादातर ऐसी जगह अनाज भेज देते हैं।)
अगर आप लिखवाकर आ गए तब तो वह सेवा में आता है। अगर आपने अपने हाथों से जरूरतमंद को दिया, वह सत्कर्म में आता है — उसके लिए आपको मेहनत करनी पड़ेगी, जरूरत का ध्यान रखना है कि उसने उसका उपयोग किया। सेवा भी ठीक है, मिला-जुलाकर सेवा भी करो। अगर आप सेवा करोगे और आपकी इच्छा है अपने आप तक पहुंचने की, सत्कर्म की, तो ऊपर वाला मौका देगा, और जो भी धन-वैभव आएगा उसे आप लोगों में लगाओगे। करते रहो — बुरा करने से अच्छा है अच्छा करना। कुछ न कुछ तो तुम करोगे ही, यह खोपड़ी कुछ न कुछ करने को चाहिए, इसलिए इसे सही जगह लगाकर रखो।
सारा खेल भाव का नहीं, सारा खेल 'चाहिए' का है — 'चाहिए' में भाव पैदा होता है; 'चाहिए' नहीं तो भाव खत्म। जैसे इन्होंने नोट वाली बात बताई — बीस का पुराना नोट भी चलेगा, लेकिन नया दिया तो सामने वाला खुश हो रहा था; कोई भी नए को देखकर खुश होगा, मूल्य अंदर वही है पर आपको सड़ा नोट अजीब लगेगा। हर शरीर के पीछे वही तो है, लेकिन आप रूप में फंस गए हो, स्वाद में फंस गए हो — चावल ठीक नहीं लग रहा, पुलाव ठीक लग रहा है; पुलाव के पीछे भी तो चावल है। और सिर्फ चावल में ही नहीं, चावल के पीछे वाले में भी फंसे हो — चावल वह दे जिससे आप प्रेम करते हो और पुलाव वह दे जिससे नफरत करते हो, तो खाने में कौन जमेगा? जिससे प्रेम है उसका चावल; पुलाव में घुटन होगी।
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