प्रश्नोत्तर P3-0116 · भाग 3
आपको आत्मज्ञान (उपलब्धि) कब हुआ — क्या उसकी कोई तारीख है? उससे पहले क्या स्थिति थी?
जब मैं सीखने के लिए निकला था तो मैंने कभी भी सिखाने की बात नहीं की। लोगों ने कहा भी कि आपको ज्ञान है — मैं कहता नहीं, ये किसी के शब्द हैं, मैंने किताब पढ़ी है, यह किताबी ज्ञान है, किसी और का है; जब मुझे होगा तब मैं आऊंगा। एक गांव में दिसंबर से 1 जनवरी तक कई दिन रहा, रात एक-दो बजे तक बात होती थी; लोगों ने पहले तय किया कोई चरवाहा है, फिर सुनने लगे तो बोले आपको ज्ञान हो गया है। मैंने कहा नहीं हुआ, लेकिन यह पता है कि होने वाला है, मैं आखिरी में पहुंच गया हूं; और अगर मुझे हुआ तो इस गांव में फिर आऊंगा।
कौन सी डेट को हुआ, नहीं पता। जनवरी में कुछ हुआ, क्योंकि खोजते-खोजते खोजने के लिए कुछ नहीं बचा था, वह खत्म हो गया था। मैं ऐसे ही नर्मदा तट पर घूम रहा था, जाने के लिए कोई स्थान नहीं था — कहां जाऊं? 12 ज्योतिर्लिंग, चारधाम, गंगासागर, अनेक शक्तिपीठ, श्मशान, नदियां — जा-जाकर थक गया था। उसी जनवरी 2020 में मेरी आखिरी उम्मीद टूट गई — आत्मज्ञान की भी उम्मीद टूट गई; निराश, हताश, थक गया। एक जन ने कहा था मैं बताऊंगा, उन्हीं के साथ जा रहा था; आगे जाकर उन्होंने मना कर दिया। थक तो पहले भी गया था, लेकिन उनके आश्वासन से एक और उम्मीद बन गई थी कि कोई तो मिला; उन्होंने मना किया तो वह उम्मीद भी टूट गई। मेरी तरफ से फाइनल हो गया। उसके बाद प्रश्न हट गए, उत्तर हो गए — कब हो गया, मुझे नहीं पता। याद की बात ही नहीं; याद नहीं कहूं तो इसका मतलब कभी पता था — कभी पता नहीं था।
और मैंने जब भी पूछा, उसी व्यक्ति से पूछा, कभी तीसरे को नहीं लाया, और लाने भी नहीं देता था — हम तुम हैं, दो बहुत हैं, दो में ही कुछ हो सकता है। लोग कहते थे जन्म-जन्म लगते हैं; मैं कहता, कोई तो जन्म आखिरी होगा — मैंने तय कर लिया यह जन्म आखिरी है, मुझे कुछ मिले या न मिले, चाहे कुछ भी हो जाए; मार्ग हो तो बताओ, नहीं तो आगे निकलूं। आशीर्वाद या श्राप का — मैंने तो इस दुनिया में दुख का चुनाव किया। 2019 तक इस क्षेत्र में घूमा, मेरा न कोई भक्त हुआ न चेला; झोपड़ी से लेकर अरबपति तक आते हैं, मुझे मतलब नहीं तुम कौन हो — इंसान हो, सत्संग की जरूरत है तो आओ। इस दुनिया में मैंने दो को देखा — एक सीखने वाला, एक सिखाने वाला; तीसरे को तो मैंने नहीं देखा।
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