आध्यात्मिक प्रत्यक्ष ज्ञान

प्रश्नोत्तर P30-0086 · भाग 30

गुरु जी, 33 कोटि देवता और नौ दुर्गा के बारे में मैं संतुष्ट नहीं हूं, कृपया समझाएं।

देखिए, पहले भोजन की वैरायटी कम थी, अब ज्यादा हो गई। ऐसे ही अलग-अलग अपना देवता, अलग-अलग तरीके से लोग मानने लगे; लेकिन पीछे एक ही है। चाहे पराठा खाओ, रोटी खाओ, पूरी खाओ — पीछे एक ही सत्ता है, रूप बाहर अलग-अलग हैं। कोटि माने प्रकार। अपने को इसमें ना जाकर बस यह देखना है कि अपने आचरण को कैसे बदलकर सुधार करें, क्योंकि वो जानकर कोई मतलब हासिल नहीं। अपने को तो एक ही पकड़ना है, एक से ही काम चलेगा। बस एक को पकड़ लो — अपने आप को — और अपना कल्याण कर लो। यह वृक्ष का मूल है, जड़ है; पत्तों को क्या देखेंगे, पत्ता-पत्ता सब अलग-अलग है। आप पूरे विश्व के भोजन की वैरायटी, सब भाषाएं, सब आदमी — किसी का भी पता नहीं कर पाओगे। एक आदमी सबसे नहीं मिल सकता, लेकिन सब एक से मिल सकते हैं — यह ध्यान से समझना। एक की तरफ बढ़ो, सब की तरफ ना जाना। गलती हमारे से यही हो रही है, हम सब जानना चाहते हैं। यह संसार भवसागर है — भव का मतलब जिसका आदि-अंत नहीं है। इस शरीर में कितने रोएं हैं, कितने छिद्र हैं, आप गिन नहीं सकते; बस नौ का पता है क्योंकि उनका हम उपयोग करते हैं। अपने को छोड़कर बाहर जितना जाओगे, पहुंचोगे ही नहीं; जहां पहुंच सकते हो वहीं प्रयास करो।

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वीडियो: अंतःकरण क्या है कहां स्थित है और क्या कार्य है ? #yogijikasatsang #live_satsang #Aadhyatmik · 2024-12-04