प्रश्नोत्तर P30-0145 · भाग 30
गुरु जी, थोड़ा डाउट आ रहा है — एक आत्मज्ञानी होने के बाद भी उसका कर्म, प्रारब्ध कर्म बाकी रहेगा?
आत्मज्ञान तो — आप निर्विकार हो गए, सिर्फ आपने अपना कांसेप्ट क्लियर किया कि मुझे कहीं पहुंचना था, मैं पहुंच गया। लेकिन मेरे पुराने कर्जे हैं, लेने-देने हैं — उस लेनदेन में कोई राग-द्वेष तो होता नहीं। आपने किसी से कुछ लिया है, तो किसी भिन्न रूप में दोगे — ये बाकी रह जाता है। अरे भैया, कोई गरीब का बच्चा तैयारी करके नौकरी पा ले, तो नौकरी उसका कर्जा थोड़ी ना उतारेगी; कर्जा तो नौकरी के बाद उतारना पड़ेगा — जैसे एजुकेशन लोन बाद में देना पड़ता है। मुझे भी ये होने के बाद पता चला; मुझे भी यही पता था कि आत्मज्ञान मतलब फाइनल। इसलिए मैंने आत्मज्ञान के लिए ही प्रयास किया, और यात्रा में अनेकों संकल्प ले लिए। अगर मुझे शायद पता होता तो मैं आखिरी यात्रा करता। संकल्प में कोई कामना, कोई इच्छा तो थी नहीं — प्रेमवश लिया था। चाहता तो उसे छोड़ के जा सकता था, कोई दोष भी नहीं लगता; लेकिन वो प्रेमवश नहीं जाता। फिर वो देखता है कि संसार में इतने दुखी हैं, इतनी व्याकुलता है, ये निकलना चाह रहे हैं, निकल नहीं पा रहे — तो चलो, हमारा तो हो ही गया है, हम इनके लिए कुछ कर देते हैं — प्रेमवश, दयावश, करुणावश।
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वीडियो: कल आपने बोला मैं पूछ नहीं पाई... #योगी · 2026-05-31