आध्यात्मिक प्रत्यक्ष ज्ञान

प्रश्नोत्तर P30-0146 · भाग 30

गुरु जी, परमात्मा से मिलने से ये (लोगों के लिए) प्रेम ज्यादा है?

हां, ये ज्यादा है। अभी मैं यहां से बोल रहा हूं कि उससे मिलने से ज्यादा मुझे यह कार्य लग रहा है, क्योंकि अब मैं उसके योग्य हो गया, वो मिलेगा। अगर मैं वहां (यात्रा में) होता और आप पूछते, तो मैं बोलता — सबसे जरूरी वो है, पहले मैं उससे मिलूंगा; क्योंकि व्यक्ति अगर एक झुंड के साथ पीड़ा में है, तो सबसे पहले वो खुद निकलना चाहता है। लेकिन अब मुझे लग रहा है कि उससे मिलने से ज्यादा यह कार्य बहुत जरूरी है, इसलिए कि ये उसी का कार्य है। अगर हमारी वो क्षमता है तो हम अनेक लोगों को उससे मिलाएं; अकेले जाने से अच्छा है, और लोगों को ले चलो, क्योंकि ये भी तड़प रहे हैं, दुखी हैं, निराश हैं — पता नहीं कितने हजारों-लाखों जन्म तक ऐसे भटकते रहेंगे, इनकी निकलने की शक्ति भी नहीं है; कोई गुरु ही बनकर आएगा, इन्हें खींचेगा। तो जब मेरी वो सामर्थ्य हो गई, तो मैं ही इनको खींचूं। उससे मेरा मिलना पक्का हो गया, उसमें संशय नहीं — रिजर्व है। हम जल्दी मिल सकते थे, लेकिन यह संकल्प ले लिया तो अब लेट होगा — लेट में भी खुशी है, क्योंकि पक्का हो गया। लायक बेटा तो यही करेगा ना, कि बाप का बचा हुआ काम करके ही मिलूं। वो तो कहता है कि सबसे पीछे मैं चलूंगा, पहले सबको ले चलो। आत्मज्ञान होता है, उसी क्षण वो (मिलन) पक्का हो जाता है। और संकल्प ना रहे तो बहुत ऐसे महापुरुष अपने आनंद में ही विचरण किए — ऐसा भी नहीं कि उनको दोष लगा, और ऐसा भी नहीं कि जो कुछ कर रहा है उसे कुछ ज्यादा मिलेगा। पूरी तरह तुम स्वतंत्र हो।

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वीडियो: कल आपने बोला मैं पूछ नहीं पाई... #योगी · 2026-05-31