प्रश्नोत्तर P30-0149 · भाग 30
गुरु जी, तो यह तो नहीं कि वो (आत्मज्ञानी) अब दोबारा अज्ञानी हो जाएगा?
दोबारा कैसे अज्ञानी होगा, अगर कुछ धारण नहीं करेगा? कुछ बोल नहीं सकते — कभी ना कभी तो उस परम स्थिति से भटका है; अगर वो सचेत नहीं रहा तो कभी हो भी सकता है। क्योंकि हम कभी ना कभी उस मूल अवस्था से हट के आए हैं, तभी तो आप प्रयास कर रहे हो वहीं पहुंचने का। तो मेरा तो यही कहना है कि क्या हो सकता है, क्या नहीं — अभी हम अपने उद्धार के लिए क्या कर सकते हैं, मुझे वो करना चाहिए। बहुत लोग अपने आनंद में रहते हैं, इसलिए कि जब आप किसी के लिए काम करते हो, तो सामने वाले जैसा होना पड़ता है — उसके जैसा होकर ही उसे समझाया जा सकता है; फिर उस स्थिति से आना पड़ता है, उसको समझा के फिर उस स्थिति में जाने के लिए समय लगता है। इसीलिए ज्यादातर लोग यह चुनाव कर लेते हैं कि अपने आनंद में पड़े रहो, ये समझने वाले तो हैं नहीं। लेकिन मैंने यही सोचा था — ना मुझे आनंद चाहिए, ना आत्मा चाहिए, ना परमात्मा; मुझे इस पृथ्वी पर एक प्रत्यक्ष ज्ञान उतारना था, जिससे अनेक जीवात्माओं का कल्याण हो। अगर मैंने चाहा, तो अपनी जिंदगी में लोगों का उद्धार चाहा, और उस उद्धार के लायक मैं पहले बना। चाहने वालों की कमी नहीं है, लेकिन चाहने के बाद काम करने वालों की बहुत कमी है। मैंने चाहा, उसके लायक बना और फिर मैंने काम किया। पहले मैंने भाव बनाया कि मुझे लोगों के कल्याण के लिए काम करना है; फिर मैंने अपने आप को उस लायक बनाया — इसलिए मैंने 12 साल का भ्रमण किया; उस योग्य जब मैं बन गया, फिर मैंने काम करना शुरू कर दिया। मेरा यही भाव था कि जो मेरे साथ हुआ, लोगों के साथ नहीं होने दूंगा। लोग समझें या ना समझें, मुझे कोई फर्क नहीं है। मेरा ध्यान सिर्फ मेरे काम पे रहता है; मुझे पता है मैं क्या कर रहा हूं। और जब उसका परिणाम आएगा, तो लोगों को भी पता चल जाएगा कि मैंने क्या बोला और क्या किया।
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वीडियो: कल आपने बोला मैं पूछ नहीं पाई... #योगी · 2026-05-31