आध्यात्मिक प्रत्यक्ष ज्ञान

प्रश्नोत्तर P30-0155 · भाग 30

गुरु जी, लगभग दो साल से मैं अकर्ता के भाव से जी रहा हूं — मैं कुछ करता नहीं, जो कुछ है लड्डू गोपाल की प्रेरणा है, वो जानें, वो करा रहे हैं, उन्हीं की इच्छा है।

ठीक है, बस इतना ध्यान रखना — यह तो हम कह देते हैं कि मैं अकर्ता हूं, कर्म करते हुए लिप्त नहीं हूं; लेकिन यह कब पता चलता है? जब आपके विपरीत परिस्थितियां बनती हैं, तब पता चलता है कि कर्ता कौन है। स्वाभाविक, आपके तरीके से जब सब कुछ हो रहा है, तब आपको लगता है कि वो सब कराने वाला है; लेकिन जब विपरीत परिस्थितियां बनती हैं, ऐसी दुर्घटना होती है जो आप नहीं चाहते या झेल नहीं पा रहे हो, तब पता चलता है कि आखिर कर्ता है कौन। जैसा मैं नहीं चाहता था और वैसा हो — उस समय मानसिक स्थिति की जांच करिए। अगर कर्ता वो है, तो हमारे सामने कोई भी परिस्थिति आ जाए, उसमें ना सुख ना दुख, प्रसन्नता रहे, आनंद रहे — तब मैं समझूं कि कर्ता वो है। अगर आप गृहस्थ जीवन में हैं, लोगों से जुड़े हैं, तो हादसे कई होते हैं, स्वयं के ऊपर भी होते हैं — बीमारी आती है, विपरीत परिस्थितियां बनती हैं — उस समय पता चलता है। जब मेरा अपमान हो — क्योंकि कर्ता वो है, तो आप कहीं गए, आपका अपमान उसने कराया; तो आप काम करो ना, अपमान पे क्यों ध्यान दे रहे हो? उसने अपमान कराया तो उसे स्वीकार कर लो, जैसे सम्मान को स्वीकार किया। अगर दोनों को एक भाव में स्वीकार कर लिया, तब आप उस समय के लिए कर्ता नहीं। यह यात्रा स्वयं की है; हर बात को स्वयं से जांचना है। खिलाने वाले को कभी नहीं पता चलेगा कि आपका पेट भरा या नहीं — यह आप ही को पता चलेगा। मुक्ति का मार्ग तो गुरु बताएंगे — आप जिस स्थिति-परिस्थिति में हैं, जहां तक यात्रा किए हो, उसके आगे की यात्रा बताएंगे। और अपने आप को सत्कर्म में लगा दो — सत्कर्म मूल है जल्दी पहुंचने का। सर्वप्रथम ईमानदारी — देश, काल, स्थिति, परिस्थिति में कभी भी कुछ भी हो जाए, ईमानदारी मत छोड़ना; और हर स्थिति-परिस्थिति में अपने आप को जांचते रहना कि मेरी मानसिक स्थिति क्या है। शारीरिक स्थिति तो आपने बना दी कि मैं जवाब नहीं दूंगा, लेकिन मानसिक जवाब आप दे रहे हो क्या? मजबूत को धक्का लगता है तो शरीर से जवाब देता है, कमजोर मानसिक जवाब देता है — जवाब दोनों देते हैं, एक का दिखता है, एक का नहीं दिखता। जब वह मानसिक जवाब देता है, तो प्रकृति उसे दंड देती है — किसी और रूप में आकर दिलवा देती है।

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