प्रश्नोत्तर P30-0156 · भाग 30
गुरु जी, परिवार में रहकर सब करते हुए मन ज्यादा विचलित नहीं होता; लेकिन जब मन के विपरीत होता है, तो थोड़ी-सी कसक अभी भी है। उसे निकालने का रास्ता क्या है? मेरा कोई अपराध नहीं, फिर भी सामने वाला चढ़ाई करता जाए, तो क्या करें?
मन के पीछे आप हो। मन शरीर के लिए काम करता है; मन को कुछ नहीं होता, होता आपको है — मन इंगित करता है। सबसे खतरनाक क्या है? मान की इच्छा। इसको छोड़ना इतना आसान नहीं है; अगर इसको छोड़ दिए तो उपलब्धि होगी। उस परिस्थिति में अपने आप को, अपनी आत्मरक्षा, स्वाभिमान की रक्षा करनी है, बस। आत्मरक्षा दोष नहीं है। उसे जवाब ना बाहर से देना है, ना अंदर से देना है। आपको यह समझना है कि ये मेरे कर्म कट रहे हैं — क्योंकि बिना मतलब का मिल रहा है, इसका मतलब मैंने इसके साथ कभी न कभी दुर्व्यवहार किया था, तो ये मेरे साथ कर रहा है। मुझे इतनी बुद्धिमानी रखनी है कि अपनी आत्मरक्षा करनी है, बस — आत्मरक्षा का अधिकार हर जीव को है, उसमें दोष नहीं लगता; उससे ज्यादा नहीं, क्योंकि आपका कर्म कट रहा है, उसे कट जाने दो। क्षमा भी नहीं करना है — अगर आपने उसे क्षमा किया तो फिर आप कर्ता में आ गए। इस संसार में वही महान है जो अपमान के घूंट को पी ले। इसे पचाना इतना आसान नहीं — भूख बर्दाश्त कर सकते हो, अपमान नहीं; इसको जिसने भी पिया, वो पहुंचा। यही हमसे नहीं पिया जाता, उगल देते हैं। अगर इसे पी लिया — ना शरीर से, ना मानसिक जवाब दिया — तो आप महान हो गए। और अपमान बेमतलब का ही होगा: अगर आपने काम करते हुए गलती की और किसी ने डांटा, तो वो अपमान नहीं — काम बिगड़ा इसलिए डांटा, भरपाई हो गई। अपमान वो होता है जो बिना मतलब का किया जाए। और ऐसा होगा — आप अगर अपनी तरफ बढ़ोगे, तो आपके साथ ऐसा होगा; आपको लगेगा मैं हर तरीके से इससे जीत सकता हूं, लेकिन वही तो आपको जांचना है। उस समय आपकी मानसिक स्थिति का पता लगाना है कि मैं कहां हूं — उसमें कोई प्रतिक्रिया ना देना, बस अपनी आत्मरक्षा करना है।
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वीडियो: #भटकाव किसका है मन का या खुद का ? (Is Distraction of Mind or Self? ) Explained in hindi · 2026-03-10