प्रश्नोत्तर P30-0157 · भाग 30
गुरु जी, ऊर्जा का रूपांतरण, सांस की प्रक्रिया करता हूं तो ऊर्जा मणिपुर तक, पीठ तक आती है; इसके आगे — आज्ञा चक्र और उसके ऊपर — की यात्रा कैसे होगी?
इसके ऊपर तो तभी जाओगे, जब आपको अपने तरीके से कुछ नहीं चाहिए। वाक सिद्धि के ऊपर तभी जाओगे। (घटनाओं का पूर्वाभास) हो जाए, तो इसमें फंसना भी मत, किसी को बताना मत; बताया तो जहां से चले थे वहीं आ जाओगे। मान के लिए — जैसे आपको पता चल जाए और आपने बता दिया, "देखो मैंने बोला था, हो गया" — अब गिरना चालू; क्योंकि आप उसे रोक तो सकते नहीं, कोई भी घटना रोकी नहीं जा सकती। तो बताने वाली गलती कभी मत करना। ज्यादातर लोग वाक सिद्धि में फंसते हैं, पता भी नहीं चलता; उन्हें लगता है मैं हित कर रहा हूं — "जाओ, तुम ठीक हो जाओगे, बुखार ठीक हो जाएगा" — वो सोचते हैं कल्याण है, उसमें वो गिर जाते हैं; बाद में नाम, शोहरत, पैसा धीरे-धीरे पकड़ने लगता है। यहां तक तो बहुत लोग पहुंच जाते हैं, इसके ऊपर कोई नहीं जा पाता; इसके ऊपर तभी जा पाओगे जब आंतरिक रूप से अपने तरीके से कुछ नहीं चाहिए — बिल्कुल निर्विकार भाव। और एक बार आज्ञा चक्र खुल गया तो बात खत्म हो गई — परिपूर्णता आ गई, तब नीचे गिरना नहीं होगा। इसके ऊपर वही जा पाता है जिसे कुछ भी नहीं चाहिए — तीनों लोक का वैभव, सुख-समृद्धि दिया जाए, वो भी नहीं चाहिए। यात्रा तो खुद ही को करनी है; आपको मार्ग बताएंगे लोग, आपको समझदारी से चलना है। नहीं हो रहा है, तो कहीं ना कहीं गलती आपकी है — आप किसी को नहीं बोल सकते कि फलां आदमी की गलती है। अगर आंतरिक तड़प, व्याकुलता सच में है, तो शब्दों के द्वारा भी आंतरिक सहायता मिल जाती है। इसीलिए तो हमें बोला जाता है भ्रमण करो — अनंत ऊर्जाएं हैं जो हमारी मदद करती रहती हैं; कुछ का आभास होता है, कुछ का नहीं। अपने तरीके से चाहिए — उसका पूरी तरह त्याग करिए, और कुछ बनने की इच्छा का त्याग करिए। दो मैं हैं — एक परम सत्यमय, एक अहम मैं। अहम मैं तभी जाएगा जब आपको कुछ नहीं चाहिए; कुछ भी चाहिए तो रहेगा। किसी भी साधक की एक स्थिति है "अपने तरीके से चाहिए" — इसमें संख्या बहुत ज्यादा है; एक है "बस उतना चाहिए जितने में जीवन-यापन हो जाए" — सामर्थ्यवान होने के बाद भी वह संतोषपूर्वक जीवन जीता है; फिर यहां आते-आते अगर "कुछ नहीं चाहिए" तक पहुंच गया, तो वो अपने आप में हो गया — लेकिन आंतरिक; बनावटी भाव काम नहीं करेगा।
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