प्रश्नोत्तर P30-0200 · भाग 30
गुरु जी, आप दूसरों की आत्मा और शरीर दोनों का ध्यान रखते हैं, फिर अपने शरीर के प्रति आप इतने निर्दयी क्यों रहते हैं? अपने शरीर का उचित ध्यान क्यों नहीं रखते?
इसलिए कि या तो मैं ध्यान आप लोगों का रख सकता हूं या तो ध्यान मैं अपना रख सकता हूं — यह दोनों बातें कभी नहीं हो सकतीं। अगर कुछ मिटता है तो कुछ पैदा होता है; अगर वह मिटेगा नहीं तो पैदा नहीं होगा। जिस दिन मैं अपना ख्याल रखने लगा उस दिन मैं आपका ख्याल नहीं रख पाऊंगा, और मैं आपका ही ख्याल रखूंगा। मैं आपके लिए काम कर रहा हूं और मैं उतना अपना ख्याल रखूंगा जितने में मैं जी सकूं। मैंने कभी धूप नहीं देखी, ना ठंडी देखी, ना बारिश देखी; ना कभी बारिश में छतरी ली। ठंडी रहे चाहे गर्मी, एक ही कपड़े में मैंने जिया। मैं तो बस एक कपड़े पर जीने वाला व्यक्ति हूं और आखिरी तक ऐसे ही रहूंगा। ख्याल व्यक्ति एक ही जगह रख सकता है, दो जगह नहीं रख सकता। तो अगर मेरे मिटने से आपको कुछ मिल रहा है तो मैं तैयार हूं अपने आप को मिटाने के लिए — बस आपको मिल जाए, आपका उद्धार हो जाए, आप उस परम आनंद में स्थिर हो जाओ। यही मेरा भाव है आप लोगों के प्रति।
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