आध्यात्मिक प्रत्यक्ष ज्ञान

प्रश्नोत्तर P31-0050 · भाग 31

गुरु जी, परिवार में रहकर भजन कैसे करें, आत्म-चिंतन कैसे करें?

ईमानदारी और सत्कर्म अपनाएं। साधना करते हुए ज़िंदगी में एक बात याद रखना — "मेरा" का जहां भाव है, वहां कभी साधना नहीं होती; ऐसी गलती ना करना। आपको पता है, मैं अपने जीवन में पहली बार अपनों की कुटिया बना रहा हूं। मैंने आज तक बारह साल से ऊपर भ्रमण किया, मैंने कभी भी अपने लिए एक लकड़ी भी नहीं गाड़ी — कि जैसे ही आप ज्ञान के पहले एक लकड़ी गाड़ो, आपको ज्ञान नहीं होगा। यह गलती मत करना। साधक लोग आज निकलते ही आश्रम बना ले रहे हैं, यही गलती कर रहे हैं — "मेरा" से मुक्त होने चले और "मेरा" ही बना के "मेरा" में ही साधना कर रहे हो, तो कहां से निकलोगे? राजा-महाराजा को क्या जरूरत थी भिक्षा पात्र लेकर गली-गली, जंगल-जंगल घूमने की? वो चाहते तो कितने आश्रम तट पर बना लेते। साधना "मेरा" में नहीं हो पाती, साधना प्रकृति में होती है। जहां भाव होगा "तेरा" का, वहां साधना होगी; जहां भाव हुआ "मेरा" का, वहां साधना नहीं होगी, वहां आपका पतन होगा। हां, टाइम पास के लिए, पिकनिक के लिए कई जगह बना सकते हो, लेकिन साधना अगर करना है तो "तेरा" में करना, "मेरा" में नहीं — जब तक आपको आत्मज्ञान ना हो जाए। आत्मज्ञान के बाद एक नहीं लाखों बनाओ, क्या फर्क पड़ता है — फिर आप अपने लिए लोगे ही नहीं, समाज के लिए लोगे। बुद्ध ने भी ज्ञान के बाद ही चौमासा के लिए जमीन मांगी थी, और वो भी समाज कल्याण के लिए, अपने लिए नहीं।

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वीडियो: जीवन जीने की कला क्या है ? #योगीजी_का_सत्संग #aadhyatmik_satsang #live_satsang · 2024-12-03