आध्यात्मिक प्रत्यक्ष ज्ञान

प्रश्नोत्तर P31-0147 · भाग 31

गुरुदेव, मुझे ऐसा लगता है कि मैं पूरे देश में फलदार पेड़ लगाऊं — स्कूलों, कॉलेजों, हॉस्पिटलों के सामने और सड़कों के दोनों तरफ। यही मेरे जीवन का लक्ष्य लगता है। इसको मैं कैसे संभव करूं?

पहले यह बताओ — शुरुआत की या नहीं, या बस सोचते-सोचते जीवन चला जाएगा? पूरे विश्व का ख्वाब देखते हो; जो आपके सबसे पास में स्कूल है, उसके सामने कितने पेड़ लगाए, यह पहले बताओ। ईमानदारी से बताओ, ख्वाब देखते कितने साल हो गए? बातें करना बहुत आसान है। मैं एक घटना बताता हूं — एक बालक कॉलेज कर रहा था, मुझसे बोला महाराज जी संसार में इतने जीव भूखे हैं, मुझे बर्दाश्त नहीं होता। मैंने कहा यह तो बहुत अच्छी बात है; अच्छा बताओ, कभी ऐसा हुआ कि तुमने रोटी कम खाई हो और किसी जीव को दी हो? बोला नहीं महाराज जी। तो हम लोगों को बस दिख रहा है, सपने देखते हैं — यह कर देता, वह कर देता — लेकिन कुछ कर नहीं रहे। कमी दिख रही है, लेकिन उस कमी को निकालने में आपका योगदान क्या रहा? खूब पेट भर खा लिया और बचा हुआ दे रहे हो — वह देना, देना नहीं होता। अगर देना है तो कम खाके दो, अपने हिस्से का दो, तब देने का भाव समझ में आएगा। देने के बहाने समाज से हम कई गुना ले लेते हैं और उसका भी पूरी तरह नहीं पहुंचाते, और ढिंढोरा पीटते हैं कि मैं दे रहा हूं। देना इतना आसान नहीं है; देने में व्यक्ति मिट जाता है। जिस दिन देने का भाव पूरी तरह बन जाएगा, वह परम ज्ञान को उपलब्ध हो जाएगा। समाज के लिए काम करना इतना आसान नहीं है, अपने बनाए हुए अस्तित्व को मिटाना पड़ता है। बातें करते-करते उम्र चली जाती है। जहां से हो, जिस लायक हो, देना तो चालू करो।

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वीडियो: भगवान के दर्शन कैसे करें / #योगीजी_का_सत्संग #भगवान #दर्शन #satsang · 2024-07-12