प्रश्नोत्तर P31-0170 · भाग 31
गुरु जी, जैसे तेल पानी में नहीं मिल सकता, पर सरसों का तेल निकालने से पहले सरसों को पानी में भिगोते हैं, तो पानी सरसों के साथ यात्रा करके तेल में मिल जाता है। हमें कई बार हिचकिचाहट होती है — क्या हमारे अंदर इतनी अक्षमता है कि हम गुरु जी के साथ यात्रा कर पाएं?
देखो, राम के साथ हनुमान जी, सुग्रीव — इन्होंने यात्रा की, लेकिन शबरी ने इंतजार किया, और एक बार मिलते ही राम ने उसे तार दिया। क्या शबरी ने यात्रा की थी? वो गुरु के वचन पर रही, और निश्चित राम मिले। तो गुरु जैसा कह दे वैसा करो, उसी में कल्याण है। अगर उसके साथ यात्रा की जरूरत होगी तो यात्रा भी होगी, कोई कार्य होगा — क्योंकि कार्य में ही यात्रा होती है; राम के साथ अगर किसी ने यात्रा की तो कार्य में यात्रा की। हमारा उद्धार होना चाहिए, चाहे जैसे। मृत्यु कहीं भी किसी को मार देती है, कोई जगह फिक्स नहीं है — कभी एक झटके में मार देती है, कभी महीनों-सालों घुमाती है। वैसे ही गुरु किसी को सालों में तारता है, तो किसी को एक झटके में तार देता है। यह गुरु के ऊपर है, और हमारे कर्म के ऊपर है — दोनों का मिलना होता है। मैंने उसके हाथ में दे दिया तो बात खत्म। अगर मुझे फिक्र है तो इसका मतलब उसके हाथ में नहीं दिया। जब सौंप दो तो बात खत्म, फिर प्रश्न-चिन्ह नहीं होना चाहिए कि ये कैसे होगा, वो कैसे होगा। प्रश्न खड़ा है तो अभी आपने सौंपा नहीं।
सत्संग वीडियो देखेंऐप में खोलें
वीडियो: कौन गुरु ? कौन शिष्य ? #योगी · 2026-07-18