प्रश्नोत्तर P4-0076 · भाग 4
(वही सन्यासी महाराज जी) गुरु जी, जब हम यात्रा में चले थे तो आपने कहा था कि भेष के लायक हो तो पहनो, और ऐसे ही उतार के मत फेंकना — जिस दिन अंतरात्मा बोले (तब छोड़ना)। यही पूछ रहा हूं — भेष को कब और कैसे छोड़ना चाहिए?
जिस दिन आपको लगे कि मैं नहीं निभा पा रहा हूं, उस दिन छोड़ देना — प्रणाम करके छोड़ना, और बोल देना कि जिस दिन लायक होऊंगा, उस दिन पहनूंगा। और जिस दिन लायक बन जाओगे, जरूरत ही नहीं पड़ेगी। लायक बनने के लिए कपड़ा है। जैसे विद्यार्थी का कपड़ा कब तक? जब तक वो विद्यार्थी है। डिग्री पाने के बाद थोड़ी ना उसे उस कपड़े की जरूरत है। ये कपड़े की जरूरत तभी तक है जब तक आप साधक हैं। जिस दिन आपका परम स्तर उठ गया, आपको कपड़े से कोई मतलब ही नहीं रहेगा। ये एक आपके मार्ग में सहायक है।
(जब साधक ने कहा कि मैं इसे कपड़ा समझ के पहनूंगा, जिस दिन लगेगा कि नहीं पहनना है तो छोड़ दूंगा —) नहीं पहनना है तो क्यों नहीं पहनना है? और पहना तो क्यों? ये प्रश्न करके — ऐसे ही नहीं उतार के फेंकना है। अब तू उतार रहा है तो क्यों? किसके लिए? अब क्या करेगा, कौन सा नया नाटक रचने तू जा रहा है, ये बता? तू उतार रहा है, इसका मतलब लूट रहा था — अब किसको लूटेगा? अब कौन से भेष को धारण करेगा? ये अपने से प्रश्न करना है। ऐसे ही नहीं कि जब चाहे पहन लिया, जब चाहे उतार लिया।
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वीडियो: 25 जनवरी 2026 रविवार प्रश्नोत्तरी#योगी · 2026-01-25