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प्रश्नोत्तर P4-0077 · भाग 4

(कुटिया में सन्यासी महाराज जी के संदर्भ में) क्या गुरु से दूर रहकर भी गुरु की कृपा मिल सकती है? पास रहने और दूर रहने में क्या अंतर है?

(अगर वो दूर रहकर) आना चाह रहा है लेकिन आ नहीं पा रहा है — कोई विवशता है — तब गुरु कृपा कर देता है। लेकिन विवशता नहीं है, वो विवश बन के बैठा है, विवश बता रहा है, तब नहीं होती। अगर विवश है, वो नहीं आ पा रहा है, तो फिर वो कृपा वहीं से कर देता है। जैसे वो माता जी मुंबई वाली — फोन की, तो बोली कि आप बस आवाज सुना दो। स्पीकर तो ऑन ही था। वो बोली — मैं तो नहीं आ सकती, मैं विवश हूं, लेकिन मुझे पता है वो आ जाएंगे, उन्हें बस मेरी आवाज तो सुना दो। तो आवाज तो सुन ही रहा था। कुछ समय बाद माहौल ही ऐसा बना कि हम उसके करीब चले गए, उसके ही एरिया के पास, जहां तक वो आ सकती थी। देखिए, आना उसे भी पड़ा; वहां तक नहीं आ सकती थी, तो प्रकृति ने जहां तक वह आ सकती थी, मुझे भेजा, और आके मिल ली। तो आप देखो — अगर विवश हो, नहीं आ पा रहे हो, और उसके शब्दों में जी रहे हो, तो गुरु आप पर कृपा करेगा। यह मेरा व्यक्तिगत अनुभव है। एक घटना है मेरे जीवन में — हमारे पास बहुत लोग आते थे। एक महाराज जी बहुत परेशान थे, उनकी आंखों की (रोशनी) कम थी। तो वो सुनते थे कि एक बाबा आए हैं और वो पैर से छू देते हैं, आशीर्वाद देते हैं और सब ठीक हो जाता है। तो वो मेरे आने के लिए विवश थे — लगभग 60–70 किलोमीटर होगा, जंगल में। ये तो मिलने के बाद बता रहा हूं। तो यहां से मैं एक दिन बोला कि चलो कहीं घूमने चलते हैं; मुझे जगह थोड़ी मालूम था। उन्होंने बताया कि एक जगह है, हनुमान जी का मंदिर। जब मैं वहां पहुंचा, वो बाबा भी मिले। बातें हो रही थीं, बोले — हमको भी उसी क्षेत्र में जाना है, एक बाबा आए हैं, जिसको भी छूते हैं वो ठीक हो जाता है; मैं बहुत दिन से प्रयास कर रहा हूं लेकिन कोई ले जाने वाला मिल नहीं रहा है। हम कहे — उस बाबा से मिलोगे क्या? बोले — मिलना तो चाह रहा हूं, लेकिन मिलूं कैसे? लोग हंस रहे थे; मैंने उन्हें इशारा किया, बताना मत अभी। फिर पूछा क्या तकलीफ है? बोले आंखों से बहुत कम दिखता है। फिर मैंने कहा — मिल लो, सामने है। फिर उन्होंने साष्टांग प्रणाम किया, हमारी भी आंखें भर गईं, फिर मैंने उन्हें पांव से छुआ और उनकी आंख तुरंत ठीक भी हो गई। पहले हो जाता था; मैं किसी का दुख बर्दाश्त नहीं कर पाता था; लेकिन अब छोड़ दिया। फिर मैं उस क्षेत्र में जब रहा तो उनके घर पे भी जाके मिल लेता था — गृहस्थ सन्यासी थे, बहुत सज्जन थे। तो कहने का मेरा मतलब यह है कि अगर आप विवश हो और गुरु के शब्दों में जी रहे हो, तो गुरु आप तक पहुंच जाएगा — आप चाहे दुनिया के किसी कोने में रहो, वो आप तक किसी के द्वारा पहुंच जाएगा, निमित्त (बनाकर)। मेरा यही कहना है कि अगर मेरे द्वारा किसी का हित हो तो मैं दुनिया में कहीं जाने के लिए तैयार हूं, लेकिन लोग लाभ लें तो ना। अब यहां 16–18 घंटे सत्संग करता था, लोग समझ नहीं पाते, इसलिए कम कर दिया। अभी तो हफ्ते में रविवार को मिल रहा है। अब कनाडा जाने की तैयारी हो रही है, यूएसए लोग वहां बुला रहे हैं, तो ये भी धीरे-धीरे कम हो जाएगा। क्योंकि विश्व लेवल पे काम करेगा व्यक्ति, तो हर व्यक्ति से थोड़ी ना मिल पाएगा। अभी तो यह है कि अभी भी मिल पा रहे हो; पहले तुम (मेरे साथ) 24 घंटे थे। एक दिन ऐसा आएगा कि हम कहीं, तुम कहीं — और आना ही आना है। तो समय रहते लाभ उठा लो। एक समय था — इनके गांव में सेवक राम बैठे हैं — इनके साथ 24 घंटा घूमता था; जब चाहो तब इनकी बाइक पर बैठकर घूमता था, वीडियो बनाता था कि लोगों तक कैसे भी ज्ञान पहुंचे। अब इनको मिलने आना पड़ता है, 60–70 किलोमीटर; अब मैं जाके नहीं मिल पा रहा हूं। इतना काम फैल गया है — आश्रम को चलाना, सत्संग करना, इसकी पूरी व्यवस्था करना, देखरेख करना। अगर अब हर व्यक्ति से मैं मिलना भी चाहूं तो संभव नहीं है। जैसे कल एक बाबा वहां सीढ़ी पे खड़े थे — एक बालक झाड़ू मार रहा था और ये खड़े होकर देख रहे थे। तो मैं बहुत देर तक कैमरे में देखा। ऐसा नहीं कि मैं अंदर रहता हूं तो आप लोगों को नहीं देखता — मैं सब देखता रहता हूं कौन क्या कर रहा है। एक बालक बड़ के पेड़ के पास बैठा था, उसका पांव — मैं यही पूछने वाला था कि तू इतना पांव क्यों मोड़ रहा है? एक आसन में बैठ। यहां तक बाहर जाता हूं तो भी मोबाइल से कैमरों में देखता रहता हूं। तब मैंने फोन लगाया, बोला उनको जल्दी से बोलो — जाओ आसन लगाओ, क्या करने आए हो? जिसके लिए आए हो वो करो। ये जमीन मत देखो, ये पेड़-पौधे मत देखो। मेरा इतना भाव है कि एक सेकंड भी तुम बर्बाद ना करो। तुम्हें यहां (कुछ और) सोचना ही नहीं है। ना तुम्हारा यहां कोई मालिक है — नियम में तुम हो तो तुम ही मालिक हो। यहां तुम्हें कोई रोकने-टोकने वाला ही नहीं है। एक जिज्ञासु के लिए जितनी व्यवस्था चाहिए, वो है। तो आपको तो बस इतना करना है — अपने आत्मिक कल्याण के लिए काम। एक सेकंड भी बर्बाद मत करो। (पैर छूने की भी मनाही इसलिए है —) उससे अगर कुछ लाभ होता तो (करने देता), उसमें भी समय मत बर्बाद करो। यहां ना कोई रोक है, ना टोक है; बस जिसके लिए आए वो करो। आप जिसके लिए आए वो करो, मैं जिसके लिए आया हूं, मैं करूंगा। व्यवस्था का काम मेरा है, आपका नहीं। जब तक यह शरीर है, आपको यहां कभी कोई भी कमी नहीं पड़ेगी, क्योंकि आपके कौर में रोटी जाएगी तभी मैं उसके बाद खाऊंगा; आपकी व्यवस्था करने के बाद मैं अपनी व्यवस्था सोचता हूं। तो आत्मिकता से आप यहां रहिए, और जिसके लिए आए हो, एक क्षण भी बर्बाद मत करो। कब काल आके खड़ा हो जाएगा, मौत आ जाएगी, पता नहीं। पूरी तरह लग जाओ अपने कल्याण में। क्योंकि समझ मिली है, समय भी है — दोनों अगर मिल गए हैं तो आप सौभाग्यशाली हो; उपयोग नहीं कर पा रहे हो तो दुर्भाग्यशाली हो। क्योंकि बहुत लोगों के पास समय रहता है तो समझ नहीं, और समझ है तो समय नहीं। आपके पास अभी दोनों हैं, इंद्रियां काम कर रही हैं — तभी समझ में आ गया तो अपना कल्याण कर लो, कैसे भी।

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वीडियो: 25 जनवरी 2026 रविवार प्रश्नोत्तरी#योगी · 2026-01-25