प्रश्नोत्तर P5-0058 · भाग 5
गुरु के पास क्यों जाना चाहिए, और गुरु साधक की धारणाओं के साथ कैसे व्यवहार करता है?
एक जिज्ञासु को, एक साधक को यह ध्यान रखना चाहिए कि गुरु के पास हम इसलिए जा रहे हैं क्योंकि हम अपनी धारणाओं से परेशान हैं। जितनी भी जानकारी हमारे पास है, उससे मुझे परेशानी है, तभी तो जाना पड़ रहा है। अगर मैं उससे परेशान नहीं होता तो मैं नहीं जाता। जितने लोग मेरे आसपास हैं, जितनी मेरी समझ है, जितना मेरे पास सब कुछ है, उसी से मैं ग्रसित हूं, उसी से मैं परेशान हूं। जब आप गुरु के पास जाते हो तो गुरु आपकी धारणाएं तोड़ता है। तुम जो सोच के आए हो, वह नहीं होगा। तुम सोच के आए हो कि ऐसा ही करवाएंगे, वैसा नहीं करवाएंगे। तुम सोच के आए हो कि गुरु बड़ा सरल होगा, तो आपके लिए बहुत जटिल होगा। कोई सोच के आया है कि गुरु बड़ा कठोर है, तो उसके लिए सरल हो जाएगा। कहने का मतलब यह है कि हमारे पास जितना है, हम उसी से परेशान हैं, और उसे ही हमें छोड़ना पड़ेगा।
और आपके लिए तो मैं इतना कहूंगा। इस बार आप आए हो, और मेरा भाव आपके लिए इतना हुआ है कि मेरी नजर आपसे हटे नहीं, क्योंकि हटने लगी है। यह मैं आपको सचेत कर रहा हूं। एक बार हट गई तो दोबारा फिर नहीं जाएगी। न तो मेरे बस में है कि फिर मैं आप पर नजर डाल सकूं, न तो आपके बस में है। मैं आपसे यही सलाह दूंगा। आप पहली बार आए थे, तभी से आप पर नजर थी। आप चाहे दुनिया में जहां भी थे, मेरी नजर आप पर हमेशा बनी रही, आंतरिक रूप से। अब वह नजर हट न जाए। यह व्यक्तिगत मेरी नजर नहीं समझना, भौतिक शरीर की नजर नहीं समझना। एक गुरु की नजर समझना।
गुरु ज्ञान का प्रतीक है। गुरु दो होता ही नहीं है। गुरु सिर्फ एक होता है। मेरी यही सलाह है कि गुरु को शरीर रूप में देखो ही मत। गुरु ज्ञान का प्रतीक है। गुरु एक होता है, दो नहीं होता। जहां से भी आपको ज्ञान मिले, वही मेरा गुरु है। ऐसा मेरे द्वारा कुछ कार्य न हो जाए कि उसकी नजर हट जाए। क्योंकि उसकी नजर हट गई तो कोरे शब्द लेकर घूमते रहोगे, होगा कुछ नहीं। जैसे आप किसी को अपने परिचय वाले के यहां भेज रहे हो, और सामने वाले को कह भी दिए कि मेरा परिचित पहुंच रहा है, इसका अच्छे से ख्याल रखना। लेकिन वह यह भी कह सकता है कि अभी यह इस लायक नहीं रहा, तो जहां गए वहीं भगा दिए जाओगे। ऐसा कोई कर्म न हो कि गुरु की नजर हट जाए। गुरु तो होता ही नहीं। गुरु मेरा तेरा होता ही नहीं। मेरे तेरे से जो मुझे मुक्त करा दे, वही गुरु है।
जैसे इस पृथ्वी पर पानी एक ही जगह से आता है, दो जगह से कभी नहीं आता। निमित्त अनेक हैं। मेरा नल, तेरा नल, हर नल। दूर दूर, सात कोस पर हो, बीस कोस बाद पानी हो, तो स्वाद बदला रहेगा, लेकिन वह भी प्यास बुझाएगा। शरीर से अलग अलग तरीके से ज्ञान देते हैं, जिस तरीके से तुम समझ पाओ। लेकिन पानी एक ही जगह से आता है, दो जगह से नहीं आता। आप बाहर मत देखो। आप सिर्फ पानी को देखो। पानी से प्यास बुझेगी, नल से प्यास नहीं बुझेगी। आप लोग नल को लेकर परेशान हो। गुरु दो होता ही नहीं है। गुरु सिर्फ एक होता है। जैसे परमात्मा एक है, तो गुरु भी एक ही है। इन धारणाओं को तोड़ो। गुरु आपकी धारणाएं तोड़ता है।
अगर वह आपकी समझ से करेगा, तब तो आप वही के वही रह जाओगे। आपकी समझ से आप ग्रसित हो, परेशान हो, तो आपकी समझ से थोड़ी करेगा। अगर आपकी समझ से कर दे तो आप वहीं के वहीं रहोगे, उसी जाल में फंसे रहोगे। अच्छा तो लगेगा कि मेरी मर्जी से हो रहा है, लेकिन तेरी मर्जी से क्या हुआ। तेरी मर्जी से ही तो तू बंधन में फंसा है। तेरी जितनी भी इच्छाओं की पूर्ति करता गया, उसी में तो तू फंसा। आज अगर फंसा है तो कहां फंसा है। अपने ही कर्मों से, अपनी ही इच्छा से, अपनी ही कामना से। अपने जैसा करवाना चाहा, होता गया तो फंसता गया। जहां नहीं हुआ वहां द्वेष में फंसा, जहां हो गया वहां राग में फंसा। गुरु के पास तेरी मर्जी नहीं चलेगी। तेरी मर्जी से तू फंस जाएगा। अब उसकी मर्जी चलेगी। जब मुक्त पुरुष की मर्जी चलेगी तो तुम मुक्त हो जाओगे। अगर बंधन वाले की मर्जी चलेगी तो तुम बंधन में फंस जाओगे। तेरी मर्जी अगर चल भी जाए तो तेरा पतन है। आज अगर देखा जाए तो तेरे पतन का कारण तू ही तो है, दूसरा नहीं।
गुरु ज्ञान का प्रतीक है, शरीर का प्रतीक नहीं है। हां, उस शरीर को सम्मान है। जिस पात्र के द्वारा मैंने जल और भोजन ग्रहण किया, उस पात्र को सम्मान है। जिस शरीर के द्वारा मुझे मार्ग मिला, उस शरीर को प्रणाम है। लेकिन मुझे ज्ञान को पकड़ना है, उस शरीर को नहीं। शरीर को प्रणाम करना है, क्योंकि उसी के द्वारा तो मिला मुझे। नल को प्रणाम करना है, क्योंकि नल निमित्त हुआ प्यास बुझाने का। हमारी क्षमता नहीं थी कि हम पानी निकाल लेते। नदी निमित्त है, तालाब निमित्त है। हमारी क्षमता थोड़ी है एक बूंद पानी निकाल लेने की। नहीं है। हमारी क्षमता थोड़ी है ज्ञान निकाल लेने की। तो मुझे नदी को, तालाब को, नल को, कुएं को प्रणाम करना चाहिए, क्योंकि वही तो निमित्त हैं। अगर वे नहीं होते तो हमारी प्यास नहीं बुझती। इस शरीर को भी प्रणाम है, इसलिए कि यह शरीर नहीं होता तो मुझे ज्ञान भी नहीं मिलता। ज्ञान तो घूम रहा है जगत में, जैसे पानी पृथ्वी में है। इसे निकालोगे कैसे। पानी ऊपर भी है। तुम्हारी क्षमता है क्या, बरसा दोगे। तो उस नल को प्रणाम है जिसके द्वारा मेरी प्यास बुझी। लेकिन मूल हमें पानी से मतलब रखना है। मैं आपको फिर से यही सलाह दूंगा। मौका मिला है, पार कर जाओ।
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वीडियो: रविवार प्रश्नोत्तरी 9 अगस्त 2026 · 2026-08-09