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प्रश्नोत्तर P5-0064 · भाग 5

आप कहते हैं भगवान पे यकीन मत करो, और यह भी कि जहां है वहीं से निकाल देंगे। ईश्वर को लेकर आपका विचार क्या है?

कोई मतलब ही नहीं है। मेरे मानने से न तो हो जाएगा, न मेरे न मानने से। वह है तो रहेगा, नहीं है तो नहीं रहेगा। मेरे मानने से, न तुम्हारे मानने से, कुछ होने वाला नहीं है। देखना यह है कि मेरा कल्याण किस में है। मैं कहां खुश हूं। मैं जहां हूं, वहां खुश हूं क्या। हूं तो ठीक है, मैं रहूंगा। तब तो कोई निकाले, चाहे कोई भी आ जाए, मैं बर्दाश्त नहीं करूंगा। नहीं निकलना चाहूंगा। और अगर मैं वहां हूं और खुश नहीं हूं, तो बस मैं वहां से कैसे निकल जाऊं। बस यही बात है। ईश्वर है या नहीं है, उससे क्या लेना देना। मैं कह दूं कि नहीं है, तो भी वह है तो रहेगा, और नहीं है तो नहीं रहेगा। मैं कह रहा हूं, अगर होगा भी तो मुझसे क्या लेना देना, और नहीं भी हो तो क्या लेना देना। मुझे जिंदगी मिली है। मुझे यह देखना है कि मैं कहां खुश हूं। मैं अपने जीवन का अंत किस तरीके से करना चाहता हूं। मैं इस शरीर को कहां लगाना चाहता हूं। कौन सा काम मेरे लिए बहुत प्रिय है, बहुत अच्छा लग रहा है, जिससे मेरा भी लाभ हो और समाज के लिए लाभदायक हो, किसी को परेशानी न हो। वही करते हुए मुझे अपना अंत कर देना है। जीवन का अंत ऐसे हो भी जाएगा, चाहे जहां भी रहो। तो देखो, तुम्हें कहां खुशियां मिल रही हैं। तुम कहां खुश हो, बिना किसी को तकलीफ दिए। बिना किसी को तकलीफ दिए तुम्हें यह देखना है कि मैं कहां खुश हूं। क्या मतलब परमात्मा, क्या मतलब भगवान, जब मैं खुद ही परेशान हूं। मेरे लिए परमात्मा का क्या महत्व है। कोई महत्व है क्या। इतना दयावान होता तो परमात्मा आ जाता। मैं तकलीफ में हूं और आ नहीं रहा है, तो क्या मतलब मेरा, परमात्मा है या नहीं। मैं कैसे इतनी समझ को विकसित करके वहां से निकलूं, मुझे उसके लिए काम करना है। ये जितने कमजोर लोग होते हैं, वे या तो परमात्मा को हां कहते हैं या ना कहते हैं। जिनको जीवन में कुछ नहीं करना है, दो ही बातें करेंगे। या तो है, या तो नहीं। और दोनों कमजोर हैं। कमजोर व्यक्ति हमेशा परमात्मा के सहारे जीता है, या तो हां में या तो ना में। जो ना कह रहा है, उसको भी शिकायत उसी से है। ना में भी हां है। जब नहीं है, जो चीज नहीं है उसकी बात क्यों करना। इसका मतलब तुम्हारे जीवन में वह है, कहीं न कहीं से है। अगर आप जाकर किसी से यह सिद्ध करवा रहे हो कि परमात्मा नहीं है, तो इसका मतलब तुम्हारे जीवन में जरूर है। आप ऐसा व्यक्ति चाहते हो जो परमात्मा को प्रत्यक्ष करा दे। आपका ना कहना यह दर्शाता है कि है। अगर कोई चीज नहीं है, तो उसके बारे में बात नहीं करोगे। बचपन में माता पिता ने परमात्मा की सोच दिमाग में भर दी थी। उन्होंने डाला था। अब तो नहीं। अब तो आपकी समझ विकसित हो गई। पहले वे अपने हाथ से तुम्हारे शरीर को धोते थे। अब तुम धुलवाते हो क्या। वे बोलें भी कि धो दो, तो आप शर्मा जाओगे कि नहीं, अब मैं धो सकता हूं। जरूरी नहीं कि जितना उन्होंने डाला था, वही लेकर मैं घूमूं। अब तो मैं समझदार हो गया। मेरी समझ विकसित हो गई। क्या माता पिता ने जितना सिखाया है, उतना ही कर रहे हो। अगर उतना ही कर रहे हो, तो अपने हाथ से तो धोते भी नहीं, वही धो रहे थे। जब समझ विकसित हो गई, तब मुझे यह देखना है कि मेरे जीवन में क्या है। परमात्मा है या नहीं, आप एक बात बताओ। अगर आपको किसी से कुछ नहीं चाहिए, तो वह है या नहीं है, आपको कोई मतलब है क्या। यहां परमात्मा की खोज थोड़ी लोग कर रहे हैं। परमात्मा से कुछ चाहिए, इसलिए परमात्मा की खोज कर रहे हैं। परमात्मा आ जाए और बोले कुछ नहीं, तो आप कहोगे कैसा परमात्मा। परमात्मा है तो बोलोगे कुछ दिखाओ मुझे। अगर परमात्मा सच में आ जाए और कह दे मैं परमात्मा हूं, लेकिन मैं कुछ कर नहीं सकता, तो आप उसे परमात्मा मान सकते हो क्या। आपकी कामनाएं, आपकी इच्छाएं। आपकी सामर्थ्य नहीं है कि आप पूरी कर पाओ, इसलिए परमात्मा की बातें करते हो। परमात्मा का आश्वासन लोग देते हैं। कमजोर आदमी हमेशा परमात्मा को हां या ना बोलता है, क्योंकि वह ना में भी कुछ पा रहा है। कुछ लोग खंडन करते हैं, उन्हें भी कुछ मिलता है। हां वाले भी पा रहे हैं, ना वाले भी पा रहे हैं। लेकिन सामर्थ्यवान व्यक्ति न हां में जाता है, न ना में जाता है। वह सिर्फ अपना काम करता है। मैं जिसके लिए जन्म हुआ हूं, मैं उस उपदेश को समझूंगा, उस पर मैं काम करूंगा। मुझे मतलब नहीं है कि परमात्मा है या नहीं है। मुझे क्या मतलब। उससे क्या लेना देना। वह परमात्मा जाने। मैं हूं। इसमें तो संशय नहीं है। मुझे जीवन मिला है। मुझे किस तरीके से अपने जीवन को खत्म करना है। एक दिन तो खत्म हो जाएगा। मेरे हाथ से यह शरीर तक चला जाएगा। अब इस शरीर को मैं कहां लगा दूं। इस शरीर को इस संसार में कहां लगा दूं। आप कुछ भी करोगे, शरीर तो चला जाएगा। तो यह देखना है कि इस शरीर को मैं कहां लगा दूं। अगर इस शरीर से एक दो लोग लाभ ले रहे हैं, तो इस शरीर के द्वारा ऐसा कुछ काम हो जाए कि हजारों, लाखों, अरबों लोग लाभ लें। आने वाली पीढ़ी लाभ ले। नहीं, हमसे क्या मतलब परमात्मा है या नहीं। मैं कह रहा हूं, परमात्मा होगा भी तो क्या होगा, और नहीं भी हुआ तो क्या होगा। मेरी जिंदगी मुझे मिली है। मेरी जिंदगी कहां मुझे लगानी है, मुझे यह देखना है। मैं कहां अपनी जिंदगी लगा के खुश हूं, बिना किसी को तकलीफ दिए। बस जिंदगी जीते हुए निकल जाना है। यहां परमात्मा नहीं चाहिए। परमात्मा से कुछ चाहिए, इसलिए परमात्मा चाहिए। आप अपने जितने कर्म किए हो, उन्हें मिटाना चाहते हो। अपने दुख को हटाना चाहते हो, इसलिए परमात्मा चाहिए। या यह भी हो सकता है कि दुखी नहीं होना चाहते हो, और भगवान से डर रहे हो, इसलिए परमात्मा चाहिए। लेकिन मेन तो कर्म है। मैंने कुरान पढ़ा नहीं, तो कह नहीं सकता। किसी ने कहा था कि वहां स्वर्ग नरक की बातें होती हैं। किसी ने कहा था कि मान लिया जाए कि ईश्वर नहीं है, अल्लाह नहीं है, जीसस नहीं है, लेकिन शर्तें अगर हों, और फिर तू नरक में जाए तो क्या करेगा। अगर हो तो क्या फर्क पड़ता है। मैं जैसा कर्म करूंगा, वैसा तो मुझे परिणाम मिलेगा। बहुत लोग जेल में पड़े हैं, कैदी। उस जेल में भी कई तरह से रखे गए हैं। एक ही तरीके से उनके साथ व्यवहार नहीं किया जाता। जैसा जिसने कर्म किया, वैसा पहुंच गया। तो मैं जैसा काम कर रहा हूं, वहां मैं पहुंच जाऊंगा। नर्क क्या है। मैं अगर बेईमानी कर रहा हूं तो मैं तो अभी भी नर्क में हूं। नर्क क्या समझते हो। क्या ऊपर है क्या। एक आदमी सड़ रहा है, तड़प रहा है, नर्क नहीं है क्या। एक आदमी सब कुछ रहते घुटन में जी रहा है, डिप्रेशन में जी रहा है, सड़ रहा है। सारी व्यवस्था उसने जुटा ली है, फिर भी वह सड़ रहा है। उसका इलाज नहीं हो पा रहा है। वह मरने का इंतजार कर रहा है। तो क्या यह नर्क नहीं है। जितना आप चाहते थे उतना पढ़ लिए, अपनी क्षमता के अनुसार, तो क्या आपका जीवन अभी नर्क नहीं है। परेशान हो तो यह नर्क नहीं, यही तो नर्क है। आपका जीवन घुटन में है। जितना आपने चाहा होता चला गया, और आप फिर भी घुटन में हो, तो नर्क में ही तो हो। और कहां हो। अगर मैं आनंद में नहीं हूं, प्रसन्नता में नहीं हूं, तो मैं नर्क में ही हूं। इस पिंड में ही नर्क है। इस पिंड में स्वर्ग है। इस पिंड में मोक्ष है। इस पिंड में ही मुक्ति है। इस पिंड में ही बंधन है। जितना है, इस पिंड में ही है। और अभी जैसे हो, वैसे ही आगे जाओगे। आप देखो, आप कोई भी पद पर हो। आप हजार किलोमीटर जाते हो तो कहते हैं यह इसी पद पर है, और उस पद के अनुसार आपको इज्जत देते हैं। आप जिस कंपनी में काम करते हो, जिस पद पर हो, उस कंपनी की किसी भी ब्रांच में चले जाओ, उसी पद से इज्जत मिलेगी, वैसा ही व्यवहार आपसे लोग करेंगे। तो आप जैसे हो, जिस स्थिति में आप इस पिंड में हो, इस पिंड को छोड़ने के बाद आप वहीं जाने वाले हो। एकदम क्लियर कर लो अपनी बात को।

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वीडियो: रविवार प्रश्नोत्तरी 9 अगस्त 2026 · 2026-08-09