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प्रश्नोत्तर P5-0189 · भाग 5

सत्कर्म करने पर सिकुड़ना बनाम फैलना — कैसे समझें?

आपने उसे बीच रास्ते में छोड़ दिया, और आप लायक थे आगे पहुंचाने के। आपने उस समय के लिए कर दिया। पूरे विश्व का सोच उस समय के लिए कर दिया। अब उसे जरूरत पड़ेगी, कोई और मिल जाएगा। मैं उस वक्त क्या कर सकता हूं? ऐसे अगर मैं सबका नंबर लेता रहूं, मैं फंस जाऊंगा। अगर सबका नंबर लूंगा, कि आगे कुछ हो तो बोलना, तो आप फंस जाओगे। अभी आप मुझे मिले हो, और अभी आपकी जरूरत ये है। सबसे बड़ी जरूरत सर्वप्रथम भूख होती है। अगर किसी व्यक्ति का इलाज कराना है और भूख लगी है, तो पहले भूख मिटानी पड़ेगी। भूख नहीं मिटाओगे, तो इलाज करा के भी क्या करोगे? सर्वप्रथम भूख। उसके बाद व्याधि दूर करना, रोग दूर करना, रोग का इलाज कराना। उसके बाद तन पर कपड़ा। उसके बाद मकान। क्योंकि मकान नहीं भी है, भोजन है, तो कहीं भी सो जाएगा। बहुत अच्छा महल भी दिला दो, लेकिन भोजन नहीं है, और बीमारी में सड़ रहा है, तो कोई मतलब नहीं। तो सर्वप्रथम भूख, फिर इलाज, फिर मकान, फिर तन पर कपड़ा। तन पर कपड़ा समाज के लिए चाहिए। मुझे कोई व्यक्ति मिला, उस समय मैं उसके लिए क्या करूं, कर दिया, बस बात खत्म। उसे और कोई मिल जाएगा उसके बाद। ऐसा नहीं कि उसका नंबर लेकर उसके पीछे भागना है। मुझे ये काम नहीं करना, क्योंकि मैं फंस जाऊंगा। उसके बाद एक बीमारी और खड़ी होगी। जिससे जुड़ा होगा, वो उसे लेकर चला आएगा। मुझे प्रकृति ने जिससे मिलाया, उसके लिए करना है। आप उसको बोल दोगे कि ये नंबर ले लो, जरूरत है, तो वो अपने पड़ोसी को, रिश्तेदारों को, सबको लेकर आ जाएगा। सिकुड़े इसलिए, कि पहले चौबीस घंटे काम कर रहे थे, अब आठ घंटे काम करने लगे। अपने परिवार को समय ज्यादा देने लगे। तो सिकुड़ गए। काश और भी ईमानदारी के साथ मेहनत करके परिवार को सपोर्ट कर सकते थे। लेकिन मोह में आ गए। मोह में शांति दिखने लगी। अपने बच्चे दिखने लगे। बच्चे प्यार से बातें करने लगे। पत्नी अच्छी बातें करने लगी। लेकिन उनको दे क्या रहे हो? पेट ही तो भर रहे हो। पहले भी भर रहा था। क्या लगता है कि तुम्हारे शब्दों से उनका आत्मिक कल्याण हो जाएगा? ऐसा कुछ नहीं। उनको दे क्या रहे हो? और इतना सज्जन परिवार भी नहीं था। जब तुम बेईमानी कर रहे थे, तब पत्नी ने नहीं कहा कि बेईमानी की रोटी नहीं खाऊंगी। ऐसी पत्नी नहीं थी। तुम बेईमानी कर रहे थे तो भी मजा ले रही थी। अब तुम्हारी ईमानदारी का मजा ले रही है। बच्चे भी वैसे ही। एक तरह से अपने शरीर का शोषण करवाने लगे। पहले बेईमानी में करवाते थे। अब परिवार में करवा रहे हो। तब भी तुम्हारा उपयोग किया। अब भी कर रहे हैं। काश वो समय अपने आत्मिक कल्याण के लिए लगाते। ज्यादा से ज्यादा सत्कर्म करते। अगर आप बेईमान हुए, तो सिर्फ आप बेईमान थोड़ी थे। उन्होंने आपको सहयोग दिया। अगर आपकी पत्नी खड़ी हो जाती, कि हम ईमानदारी की रोटी खाएंगे, आपके बेईमानी के पैसे का जीवन नहीं जिएंगे, तो क्या वो आपको छुड़ा सकती थी? छुड़ा सकती थी। लेकिन वो बेईमान थी। तुम चाहे जैसे भी खिलाओ, मुझे तो मौज करनी है। ऐसे लोगों को ज्यादा समय मत दो। वो हर वक्त तुम्हें लूटेंगे। जब आदमी सफल होता है, तो लोग उसका उपयोग करते हैं। असफल हो जाता है, तो ताली बजाते हैं, हंसते हैं। समाज, मतलब आपका बनाया हुआ समाज, पूरी प्रकृति की बात नहीं कर रहा। आपके जितने लोग हैं, जब आप कुछ नया करने निकलोगे, तो पहले आप पर हंसेंगे। फिर बोलेंगे, मुझे तो पहले मालूम था, ये कुछ नहीं कर पाएगा। हर स्थिति में मजा लेते हैं। ऐसे लोगों के लिए जीना छोड़ो। उनके लिए सिकुड़ना तो बर्बादी है। तुम पहले भी बर्बाद हो रहे थे, अभी भी हो रहे हो। आप देख नहीं पा रहे। पुराने कर्मों का छुटकारा कैसे मिलेगा? आप बोले, मैंने भरपाई कर दी। कहां कर दी भरपाई? भरपाई इतना आसान है क्या? प्रकृति एक-एक दाना डालो तो कई गुना देती है। बीज डाला तो कई गुना देके खत्म कर देगी। फल का बीज डालो तो पता नहीं कितने साल तक देगी, सौ साल तक, जैसा वृक्ष हो। बड़ा पेड़ हो, एक बीज डाल दिया, पता चला कई सौ साल फल दिया। तुमने बेईमान के साथ बेईमानी की होगी, तब तो तुरंत लिया-दिया, कुछ ही दिन में खत्म। और अगर किसी ईमानदार व्यक्ति के साथ बेईमानी कर दी, तो पता नहीं कितने सालों तक झेलना पड़ेगा। बीज तो दोनों हैं। फल का बीज हो चाहे अनाज का, पौधे तो दोनों में लगेंगे। लेकिन एक कुछ दिन में नष्ट हो जाएगा, एक कई साल चलेगा। तभी आपने भरपाई थोड़ी की है। आपको लग रहा है कि किसी के साथ बेईमानी की, हॉस्पिटल में पैसा दे दिया, तो भरपाई हो गई? भरपाई नहीं हुई। पेड़ से पेड़ है, तो भरपाई नहीं हुई। आप ये मत समझना कि मैं भर दिया हूं। अब ज्यादा से ज्यादा सत्कर्म करो, और मेहनत बढ़ा दो। आप बेईमानों को समय दे रहे हो, और बड़े खुश हो, शांति है। आप मोह के बंधन में फंस गए। काश ईमानदार होते तो ठीक लगता। सच पूछो तो तुम्हारी बर्बादी का कारण तुम्हारा परिवार ही तो है। बेईमानी करते थे, उन्हें पता नहीं था? पता था। कभी रोका क्या? बेईमानी का परिणाम उन्हें मालूम नहीं था? अपने बच्चों को सिखाते हो, झूठ मत बोलो। पत्नी भी सिखाती है। और जब आप बोल के आते थे, तो आपको क्यों नहीं मना किया? आपकी कमाई का धन क्यों खाया? देखा जाए तो आपकी बर्बादी के जिम्मेदार वो हैं। पहले तो आप हो। लेकिन प्रेरणा तो वो भी थी। अगर वो आपके विरोध में खड़ी हो जाती, तो या तो आप सुधर जाते, या उसे छोड़ देते। लेकिन वो स्वार्थ थी। हम किसको समय दे रहे हैं? जिसने हमें बर्बाद किया। अब इसे बहुत गहराई से देख लो। बर्बादी का कारण बना, और उसी के साथ सुकून मिले। इससे कुछ नहीं होने वाला। आपने भरपाई अभी नहीं की। आपने क्या किया? बेईमानी से धन कमाया। कुछ हुआ तो उस पैसे से अपने आप को बचाया। सुरक्षित किया। भरपाई थोड़ी हुई है। रोग को भोगा, रोग का इलाज करा लिया। अगर कुछ घटना घटी तो उसे रोक लिया, अपनी पावर से, बेईमानी की पावर से। इसे अच्छे से समझ लो, मैं किसका साथ दे रहा हूं, मैं किसको समय दे रहा हूं। देखोगे, जिसने हमें बर्बाद किया, उसके साथ बड़े सुकून से हूं। मोह के जाल में मत फंसो। प्रत्यक्ष देखना सीखो। रिश्ते को पीछे हटाओ। अगर देखोगे, तो आपकी बेईमानी को आपके परिवार ने ही बढ़ाया। चाहे पत्नी हो, चाहे मां हो, चाहे बाप हो, चाहे भाई। जितने लोगों ने आपके धन का उपयोग किया, वो जिम्मेदार थे। उनका साथ छोड़ो। जिम्मेदारी है, तो उन्हें जरूरत में दो। और ज्यादा से ज्यादा सत्कर्म करो। उन्हें कितना दो? उतना ही दो, जितने में चल सके। उससे ज्यादा धन बचे, सत्कर्म में लगाओ। साथ छोड़ें चाहे रहें, मोह में मत फंसो। पहले मैं बेईमानी करता था, बड़ा परेशान था। अब ईमानदारी अपना ली। क्या किया? परिवार को पूरा समय। वो कौन सा परिवार है? उसका चेहरा तो देख लो। अगर एक बार विरोध करते, तो तुम उतना आगे नहीं जा पाते। शुरुआत पर ही रोक सकते थे। ऐसे लोगों को समय देके खुश मत हो जाओ। ईमानदारी अपनाने के बाद रोका गया, क्यों ईमानदारी अपना रहे हो? तो फिर तुमने क्या किया? फिर उन्हीं को समय दिया। इसलिए ईमानदारी अपनाने के बाद ज्यादा से ज्यादा ताकत इकट्ठी करो। धन, तन का बल, समझ का बल। और वो जरूरतमंद की सेवा में लगाओ। जितनी जिम्मेदारी है, उनको जरूरत में दो। और बचा हुआ धन, चाहे तन का बल, चाहे समझ, सत्कर्म में लगाओ। एक महीना अपने आप को कहीं सेवा में झोंक दो। तन का बल कहां खर्च करोगे? एक महीना जरूरतमंद की सेवा में कहीं झोंक दो, जहां आपको लगे कि जरूरतमंद है। अपनी समझ के साथ।

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